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वर्ल्ड थियेटर डे: 50 साल का हुआ चंडीगढ़ का रंगमंच, इंडियन थियेटर से हुई शुरुआत, कलाकारों से बात

Wed, 27 Mar 2019 11:58 AM IST
खुशबू गोयल रूबी सिंह/अमर उजाला, चंडीगढ़
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anupam kher
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आज वर्ल्ड थियेटर डे है और इस मौके पर सबसे बड़ी खुशी की बात यह है कि चंडीगढ़ का रंगमंच भी 50 साल का हो गया है। 1975 से अभिनेता अनुपम खेर व नेशनल अवार्डी रानी बलबीर कौर अभिनीत म्यूजिक नाटक ने सिटी के रंगमंच को ऑफिशियल तौर पर लॉन्च किया। इन दो मशहूर कलाकारों द्वारा अभिनीत नाटक थ्री पैनी ओपेरा से सिटी ब्यूटीफुल के रंगमंच का पहला परदा हटा था।
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रंगमंच ने अपनी पहली दस्तक इंडियन थियेटर डिपार्टमेंट पंजाब यूनिवर्सिटी में दी। जहां पहला ब्रैच 1972 में इंडियन थियेटर से पासआउट हुआ। इसमें पहली स्टूडेंट थीं रानी बलबीर कौर, जिनकी जूनियर मशहूर अभिनेत्री किरण खेर एवं उनके जूनियर अभिनेता अनुपम खेर थे। अभिनेत्री रानी बलबीर कौर ने बताया कि चंडीगढ़ में पहली थियेटर परफॉर्मेंस के बाद ही दिल्ली में नेशनल स्कूल आफ ड्रामा ने रंगमंच का पहला डिप्लोमा कोर्स लॉन्च किया।

चंडीगढ़ के बाद ही नॉर्थ इंडिया में रंगमंच का आगाज हुआ था। आगे पढ़िए 27 मार्च को वर्ल्ड थियेटर डे को लेकर अमर उजाला की खास पेशकश...

पहले थियेटर नहीं हुआ करते थे: रानी बलबीर कौर

देश विदेश में रंगमंच को एक अलग पहचान देने वाली मशहूर अभिनेत्री रानी बलबीर कौर ने बताया कि शहर में रंगमंच का थियेटर तो हुआ नहीं करता था। इंडियन थियेटर डिपार्टमेंट पीयू में ही पहला थियेटर बना। जहां सभी कलाकारों की ओर से परफॉर्मेंस दी जाती थीं। उन्होंने बताया कि अभिनेत्री किरण खेर से लेकर अनुपम खेर एवं मशहूर अभिनेता गुरशरण सिंह चन्नी सहित कई मशहूर एक्टर यहां थियेटर करके ही स्टार बने हैं। 1972 में पंजाब यूनिवर्सिटी से रंगमंच का आगाज हुआ। 1974 में अभिनेत्री किरण खेर एवं 1975 में अनुपम खेर ने यहां से थियेटर की पढ़ाई की।

पहले परदे उठाकर सामने बैठे दर्शकों की संख्या देखा करते थे

मशहूर रंगमंच अभिनेत्री अनिता सब्दीश ने बताया कि उन्होंने 1993 में रंगमंच की शुरुआत मशहूर रंगमंच कर्मी गुरशरण सिंह के साथ शुरू की। उस समय नाटक सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि कला के साथ सामाजिक बुराई पर कटाक्ष भी किया करते थे। वे गांव-गांव, कालोनी-कालोनी जाकर नाटक किया करते थे। 1999 में ही एक दौर ऐसा भी आया, जब लोग रंगमंच देखने नहीं आया करते थे।

ऐसे में कई बार नाटक शुरू ही नहीं किया जाता और पहले परदा देखकर सामने दर्शकों की संख्या देखी जाती थी। लेकिन आज रंगमंच को देखने के लिए दर्शक इस कदर उत्साहित रहते हैं कि वे थियेटर ग्रुप से फोन करके नाटक के बारे में पूछते हैं। रंगमंच ही इस शहर के दर्शकों एवं कलाकारों की जान है। यह मनोरंजन का साधन ही नहीं, बल्कि शहर के लोगों की जिंदगी का एक अहम हिस्सा है।

रंगमंच ही अभिनय को निखारता है: रोहिताश गौड़

मशहूर टीवी अभिनेता रोहिताश गौड़ ने बताया कि 1986 में उनकी यात्रा भी थियेटर से शुरू हुई, जहां उनको नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा रिपर्टरी कंपनी में शामिल होने के लिए हिमाचल से चुना गया। तब से लगभग छह वर्षों तक वह पेशेवर थियेटर का हिस्सा रहे हैं। हर अभिनय शैली को सीखने से लेकर वास्तव में उनके प्रदर्शन तक रंगमंच का सबसे बड़ा योगदान है।

इस चरण के दौरान सीमा बिस्वास, सौरभ शुक्ला, विजय राज जैसे अभिनेताओं के साथ उन्होंने काम किया। वे रणजीत कपूर और बैरी जॉन के लिए भी नाटक करते हैं। यह वह यात्रा थी, जिसने उनको नसीरुद्दीन शाह की कार्यशालाओं का हिस्सा बनने और इब्राहीम अलकाजी के नाटकों में भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया। यह एक सुनहरा दौर था, जिसे वे वास्तव में त्यागना चाहते हैं।
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गुजरात के गांव में किया शेक्सपीयर के नाटक का मंचन: हिमानी शिवपुरी

अभिनेत्री हिमानी शिवपुरी ने कहा कि गुजरात के एक छोटे से गांव इडर में शेक्सपीयर के नाटक को पेश करते हुए सभी कलाकार घबराए हुए थे। लेकिन हमारे द्वारा शुरू किए गए पल को देखने के लिए, भीड़ शांत हो गई और सभी ध्यान से देख रहे थे। यह मेरे लिए बहुत ही अचंभित करने वाला और सीखने का अनुभव था। यह समझना एक भारी पल था कि ग्रामीण भी कला और रंगमंच की सराहना करते हैं।

नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा रिपर्टरी के एक भाग के रूप में उनको न केवल भारत के विभिन्न शहरों में प्रदर्शन करने का अवसर मिला, बल्कि दुनिया भर में इंग्लैंड, जर्मनी, पोलैंड, दुबई आदि देशों में भ्रमण किया गया। राष्ट्रपति भवन में संगीत नाटक अकादमिक पुरस्कार प्राप्त किया गया। उनकी थिएटर यात्रा में सुनहरा पल, जो एक सपने के सच होने जैसा था।
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