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मांस से अलग हुआ नाखून: अकाली दल के लिए आसान नहीं 2022 विधानसभा चुनाव की राह

Sun, 27 Sep 2020 03:56 PM IST
ajay kumar सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
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प्रकाश सिंह बादल, सुखबीर सिंह बादल। - फोटो : फाइल फोटो
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अब जबकि शिरोमणि अकाली दल (शिअद) ने भाजपा से नाता तोड़ लिया है, ऐसी स्थिति में 2022 के आगामी विधानसभा चुनावों में दोनों की डगर आसान नहीं होगी।  पंजाब के पूर्व मूख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल  अकाली-भाजपा गठबंधन की नाखून और मांस की उपमा देते थे। गठबंधन टूटने के साथ यह प्रतिमान भी बिखर गया। पंजाब की सियासत में मांस और नाखून की राह जुदा हो गई।

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पिछले समय में पांच बार विधानसभा और पांच बार लोकसभा चुनाव शिअद और भाजपा ने मिलकर लड़े और तीन बार गठबंधन सत्ता पर काबिज हुआ था। 

2007 और 2012 में  मिलकर लड़े और जीते विस चुनाव
2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में अकाली दल और भाजपा का गठबंधन कामयाब रहा था। दोनों ने साथ चुनाव लड़कर कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया था। 2012 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल को 34.75 प्रतिशत और 2007 में 37.09 प्रतिशत वोट मिले थे।

भाजपा को 2007 में 8.28 प्रतिशत वोट मिले थे जो 2012 में घटकर 7.13 फीसदी रह गया था। लेकिन  दोनों चुनावों में 40 फीसदी से अधिक वोट मिलने के बावजूद कांग्रेस पार्टी को सत्ता नहीं मिल सकी क्योंकि शिअद-भाजपा गठबंधन को 41 फीसदी से अधिक वोट मिला था।

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2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन काफी अच्छा रहा और उसे 38.50 फीसदी वोट मिले और उसके 77 विधायक चुनकर विधानसभा में पहुंचे। पिछले विधानसभा चुनाव में सबसे अधिक नुकसान भाजपा का हुआ, जिसके महज 3 विधायक ही जीत सके थे।

उसका वोट प्रतिशत 5.4 फीसदी पर सिमट गया। शिअद का भी बुरा हाल रहा और उसके  सिर्फ 15 विधायक जीते और उसे 25.2 फीसदी वोट मिले। जबकि 23.7 प्रतिशत वोट आम आदमी पार्टी को मिले और उसके 20 विधायक जीते।

2014 के लोकसभा चुनाव में राज्य में शिअद को चार और भाजपा को दो सीटों पर जीत हासिल हुई थी। उस चुनाव में दोनों पार्टियों को 35 फीसदी वोट मिले थे, जिसमें अकाली दल को 26.3 और भाजपा को 8.7 फीसदी मत मिले थे।

 उस चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) को 4 सीटों पर जीत हासिल हुई थी और उसका वोट 24.4 प्रतिशत था, जबकि कांग्रेस ने 33.1 फीसदी वोटों के साथ 3 सीटें जीती थीं। पंजाब में कांग्रेस को 33 फीसदी मत मिलना इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि उत्तर भारत में उसका सूपड़ा साफ हो गया था।

कई नेताओं के छोड़ने से कमजोर हुई पार्टी
पिछले लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की देश में लहर चल रही थी लेकिन उस दौरान भी अकाली दल का वोट प्रतिशत घटकर 27.45 पर आ गया था। पिछले समय में शिअद से वोटरों का मोह भंग हुआ है। उसके कई दिग्गज नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। पिछले समय में पंथक नेता पार्टी छोड़ गए तो शिअद का वोट बैंक भी छिटका है।

 2022 के विधानसभा चुनावों में अकाली दल को सत्ता तभी हासिल हो सकती है जब उसको 40 फीसदी से ऊपर वोट मिले। लेकिन यह बहुत कठिन मंजिल है। इसे हासिल करने के लिए अकालियों को काफी मेहनत करनी होगी। लिहाजा गठबंधन टूटने से अकाली दल के भीतर उठने वाले विरोधी सुर तो बंद हो जाएंगे लेकिन वोट प्रतिशत के मामले में उसको नुकसान ही उठाना होगा। 
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