हरियाणा के हिसार की रैली में पीएम नरेंद्र मोदी ने सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा की लैंड डील की बात क्या छेड़ी, मामला एकाएक सुर्खियों में आ गया। इस मामले में खुद हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा को सफाई देनी पड़ी।
हुड्डा ने सरकार का बचाव करते हुए साफ किया कि अगर प्रधानमंत्री मोदी की ओर से हरियाणा सरकार पर लगाए गए आरोप सही साबित हुए तो वे मुख्यमंत्री का पद छोड़ देंगे।
मुख्यमंत्री ने कहा कि इस मामले में जो भी फैसला हुआ है वह विभागों की प्रक्रिया के अंतर्गत हुआ है। इसमें उनकी सरकार की ओर से कोई हस्तक्षेप नहीं किया गया।
उधर, चुनाव आयोग ने भी इस मामले में हरियाणा सरकार से जवाब-तलब कर लिया है। आईए जानते हैं कि आखिर ये राबर्ट वाड्रा लैंड डील है क्या? और इस पर इतना विवाद क्यों?
क्या है लैंड डील का पूरा मामला
गुड़गांव की शिकोहपुर तहसील में मौजूद खसरा नंबर 730 की पांच बीघा 13 बिसवा जमीन का इंतकाल कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा के नाम किया गया था, जिसे उन्होंने बाद में डीएलएफ को ट्रांसफर कर दिया।
लेकिन इस डील को वरिष्ठ आईएएस डॉ. अशोक खेमका ने चकबंदी महानिदेशक पद पर रहते हुए 15 अक्तूबर 2012 को रद्द कर दिया था।
इस पर प्रदेश सरकार ने खेमका का तबादला करने के अलावा उन्हें अन्य मामले में चार्जशीट कर दिया। लंबे अरसे बाद, अब इस मामले में खेमका के फैसले को रद्द करते हुए डीसी गुड़गांव द्वारा उक्त डील को मंजूरी दे दी गई।
2008 में सामने आया मामला
ये मामला दरअसल 2008 का है। प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा की कम्पनी स्काई लाइट्स हॉस्पिटैलिटिज ने 2008 में गुड़गांव की शिकोहपुर तहसील में मौजूद खसरा नंबर 730 की पांच बीघा 13 बिसवा जमीन (साढ़े तीन एकड़) ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज से फर्जी कागजात के आधार पर खरीदी थी।
जमीन का सौदा साढ़े सात करोड़ में दिखाया गया। रजिस्ट्री में कॉरपोरेशन बैंक के चेक से भुगतान दिखाया गया। इसके बाद वाड्रा ने तत्कालीन हरियाणा सरकार से जमीन पर कॉलोनी बनाने का लाइसेंस लेकर 2008 में ही उसे 58 करोड़ रुपये में डीएलएफ को बेच दिया।
चकबंदी महानिदेशक पद पर रहते हुए अशोक खेमका की 21 मई 2013 को दी रिपोर्ट के मुताबिक जांच में पता चला कि जमीन खरीदने के लिए वाड्रा ने साढ़े 7 करोड़ रुपये की कोई पेमेंट की ही नहीं थी। रिपोर्ट में आरोप है कि वाड्रा ने 50 करोड़ रुपये लेकर डीएलएफ को सस्ते में लाइसेंसशुदा जमीन दिलवाने के लिए मध्यस्थ की भूमिका अदा की।
ये सब फर्जीवाड़ा
अशोक खेमका के वकील अनुपम गुप्ता ने कहा कि ये सब फर्जीवाड़ा था। डीएएलएफ को कॉलोनी बनाने के लिए लाइसेंस चाहिए था, इसके लिए उसको कई सौ करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते लेकिन वाड्रा ने बिचौलिए की भूमिका निभा कर यह काम सिर्फ 50 करोड़ रुपये में करवा दिया।
इस डील को राज्य के चकबंदी महानिदेशक पद पर रहते हुए अशोक खेमका ने रद्द कर दिया था, उसके तत्काल बाद उनका तबादला कर दिया गया था। उन्हें अन्य मामले में चार्जशीट कर दिया।
अशोक खेमका ने 21 मई 2013 को राज्य सरकार की जांच कमेटी को दिए जवाब में ये रिपोर्ट दी थी। इसी रिपोर्ट में खेमका ने सभी रहस्यों से परदा उठाते हुए वाड्रा की कंपनी पर फर्जीवाड़े और धोखाधड़ी के आरोप लगाए थे।
जमीन सौदे में कुछ गैरकानूनी नहीं
इधर विभाग का कहना है कि जमीन सौदे से लेकर कॉलोनी के लाइसेंस देने तक में कुछ भी गैरकानूनी नहीं हुआ, वहीं, इंस्पेक्टर जनरल रजिस्ट्रेशन रहते हुए वाड्रा लैंड डील रद्द करने वाले खेमका आरोपों पर अब भी डटे हैं।
इधर हरियाणा सरकार ने इस डील पर एक जांच कमेटी बना दी थी लेकिन खेमका को इस कमेटी पर भरोसा नहीं था। उनकी दलील थी कि जांच कमेटी के तीन अफसरों में एडीशनल प्रिंसिपल सेक्रेटरी कृष्ण मोहन और एस एस जालान हैं।
खेमका के मुताबिक वाड्रा जमीन सौदे के वक्त कृष्ण मोहन खुद राजस्व विभाग के प्रमुख थे, जबकि जालान वाड्रा की कंपनी को कॉलोनी काटने का लाइसेंस देने वाले टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग के प्रमुख थे।