चंडीगढ़ की सुमन और रजनी सीनियर वुमन क्रिकेट टीम में चुनी गई हैं।
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अगर हौसले बुलंद हैं और दुनिया को मुट्ठी में करने की ललक है तो विपरीत परिस्थितियां भी आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं। ऐसा उदाहरण पेश किया है चंडीगढ़ की दो होनहार बेटियों रजनी और सुमन ने। पारिवारिक हालात ठीक न होने के बावजूद अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति और मेहनत के बलबूते पर इन्होंने चंडीगढ़ की सीनियर वुमन क्रिकेट टीम में जगह बनाई है।
ऑलराउंडर रजनी टीम की उपकप्तान भी हैं। वहीं सुमन मध्यक्रम की धाकड़ बल्लेबाज हैं। चंडीगढ़ क्रिकेट एसोसिएशन (यूटीसीए) ने इन दोनों बल्लेबाजों पर भरोसा दिखाया है। अब दोनों खिलाड़ी बीसीसीआई की ओर से जयपुर में आयोजित सीनियर वुमन वनडे ट्रॉफी में खेलेंगी। दोनों खिलाड़ियों का कहना है कि आर्थिक तंगी कभी आड़े नहीं आई। जमकर मेहनत की और आज उसके परिणाम सामने हैं।
पिता रेहड़ी पर बेचते थे टिक्की, मौत के बाद रजनों के कंधों पर आई जिम्मेदारी
रजनी ने बताया कि उनका घर बापूधाम कॉलोनी में है। पिता रेहड़ी पर टिक्की बेचते थे। उन्होंने मेरी क्रिकेट खेलने की इच्छा को कभी दबने नहीं दिया। 12 वर्ष की उम्र से ही मैंने क्रिकेट जगत में अपनी किस्मत आजमाने का मन बना लिया था। पारिवारिक जरूरतें पूरी करने में ही पिता की आमदनी खर्च हो जाती थी, लेकिन इसका मलाल कभी नहीं रहा।
सेक्टर- 26 में स्थित महिला क्रिकेट अकादमी में खेलना शुरू किया। इस दौरान पिता का देहांत हो गया। इससे बाद घर की जिम्मेदारी भी कंधों पर आ गई। खेल के कारण मैं ज्यादा ध्यान नहीं दे सकी, इसलिए छोटे भाई ने रेहड़ी संभालना शुरू किया। रजनी ने बताया कि अपने परिवार की गरीबी देखी नहीं जाती। मेरे कोच राजेश पाठा ने मुझे क्रिकेट सीखने की कड़ी मेहनत की। आज सफल हुई हूं तो लगता है कि अब अपने परिवार को भी बेहतर और खुशहाल जिंदगी दे सकूंगी।
सुमन की पारिवारिक स्थिति को देखकर कोच ने नहीं ली फीस
सुमन ने बताया कि वह मनीमाजरा की इंदिरा कॉलोनी में रहती हैं। पिता आईटी पार्क के पास चाय की रेहड़ी लगाते थे। कुछ साल बाद शहर से अतिक्रमण हटाया गया तो पिता की रेहड़ी भी हटा दी गई। इसके बाद उनके पिता दिल्ली में एक निजी डॉक्टर के यहां सहायक का काम करने लगे। वेतन कम होने के कारण परिवार की जरूरतें ही पूरी हो पाती थी।
ऐसे में दो छोटे भाई और तीन बहनों का खर्चा भी एक बड़ी जिम्मेदारी थी। ऐसे में कोचिंग के लिए रुपये मांगना ठीक नहीं लगता था। क्रिकेट का शौक पूरा करने के लिए मोहाली के पास सोहाना में कोच सतनाम के पास क्रिकेट सीखना शुरू किया। पारिवारिक स्थिति को देखकर उन्होंने भी फीस नहीं ली। वहां उन्होंने दिन-रात पसीना बहाया और आज वही मेहनत काम आई है।