जीवन में मां-बाप के बाद यदि सबसे प्यारा कोई रिश्ता है तो वह गुरु और शिष्य का होता है। हर गुरु की ख्वाहिश होती है कि उसका शिष्य उनके बताए मार्ग पर चलकर उनका नाम रोशन करे। ऐसा देखा भी गया है कि जो शिष्य गुरु की शिक्षा का अपने जीवन में अनुसरण करते हैं, सफल जरूर होते हैं। शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य पर आज ट्राइसिटी के नामचीन लोगों से उनके गुरुओं के बारे में जानेंगे। आखिर उन्होंने अपने गुरु के कौन से मंत्र अपने जीवन में आत्मसात किए हैं।
पद्मश्री जेटीएम गिब्सन (फाइल फोटो), वीपी सिंह बदनौर, चंडीगढ़ प्रशासक।
मैं अपने गुरु जेटीएम गिब्सन का हमेशा ऋणी रहूंगा
लोगों को शिक्षित करना सबसे बड़ा और सबसे अच्छा काम है। डॉ. एस राधाकृष्णन और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसे महान शिक्षक हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत हैं। शिक्षक दिवस मुझे मेरे सभी अद्भुत शिक्षकों की याद दिलाता है, जिन्होंने मुझे एक बेहतर व्यक्ति के रूप में बदलने में मदद की।
शिक्षक दिवस के अवसर पर मैं पद्मश्री और ओबीई (ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एंपायर) जेटीएम गिब्सन को याद करता हूं। उन्हें राजस्थान के मेयो कॉलेज को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का श्रेय दिया जाता है। वह वर्ष 1954 से 1969 तक करीब 15 साल कॉलेज में रहे। गिब्सन ने छात्रों के मन, शरीर और चरित्र के साथ-साथ संपूर्ण विकास पर काम किया।
उन्होंने मेयो कॉलेज में एक नए दौर की शुरुआत की, जिससे कई विद्यार्थियों का जीवन बदला। उन्होंने हमें सही रास्ता दिखा, जिसका मेयो कालेज के विद्यार्थी हमेशा ऋणी रहेंगे। उनके उत्कृष्ट और मर्मस्पर्शी व्यक्तित्व ने विशेष रूप से मेरे जीवन के उन प्रारंभिक वर्षों के दौरान एक अमिट छाप छोड़ी। मैं अपनी प्रत्येक उपलब्धि और जिस जगह पर मैं अभी हूं, उसका श्रेय इस महान शिक्षक और मेयो फैकल्टी को देता हूं।
- वीपी सिंह बदनौर, पंजाब के राज्यपाल व यूटी प्रशासक चंडीगढ़
सादगी और सरलता की मिसाल थे भुवनानंद मिश्रा, नहीं भूल सकता योगदान
मेरे एक अध्यापक थे भुवनानंद मिश्रा। मैं जब 9वीं कक्षा में पढ़ता था तब वह स्कूल के हेडमास्टर थे। मैं उड़ीसा के एक छोटे से टाउन जजपुर के एक सरकारी स्कूल में पढ़ता था। वह सरकारी स्कूल उड़िया माध्यम का था, जहां पर इंग्लिश बहुत कम बोली जाती थी। इनकी सबसे बड़ी खासियत थी कि वह रोजाना स्कूल आते थे।
धोती कुर्ता पहनते थे और हाथ में गीता पकड़े रहते थे। भुवनानंद मिश्रा हमें इंग्लिश और ग्रामर पढ़ाते थे। उन्होंने उस वक्त कहा कि अगर जिंदगी में आगे बढ़ना चाहते हो तो इंग्लिश सीखना बहुत जरूरी है। उन्होंने हमें टूटी-फूटी इंग्लिश बोलना सिखाया। हमें सुधारने के लिए उन्होंने एक इंग्लिश एसोसिएशन बनाया और होनहार बच्चों को उसमें शामिल किया।
मनोज परिदा, एडवाइजर।
मुझे उस एसोसिएशन का सेक्रेटरी बनाया। इसके बाद हम दिन में एक घंटा इंग्लिश में ही बात करते थे। यही कारण है कि मुझे जेएनयू के इंटरव्यू, स्टील अथॉरिटी, आरबीआई और आईएएस के इंटरव्यू में कभी कोई समस्या नहीं आई। मैं अपने शिक्षक के योगदान को अपने जीवन में कभी नहीं भूल सकता। मैं अभी भी उनको याद करता हूं व हमेशा करता रहूंगा। मनोज परिदा, एडवाइजर