चंडीगढ़। पीजीआई में आयोजित दो दिवसीय नियोनेटल न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर्स कार्यशाला में विशेषज्ञों ने नवजात शिशुओं में दिमाग से जुड़ी बीमारियों की समय पर और सही पहचान पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि थोड़ी सी लापरवाही बच्चे के पूरे जीवन पर असर डाल सकती है जबकि समय रहते इलाज से गंभीर स्थितियों को टाला जा सकता है। विशेषज्ञों ने अभिभावकों को सलाह दी कि यदि नवजात में झटके, सुस्ती, दूध न पीना या असामान्य हरकतें दिखाई दें तो इन्हें नजरअंदाज न करें और डॉक्टर से संपर्क करें।
एडवांस्ड पीडियाट्रिक सेंटर में आयोजित कार्यशाला के दूसरे दिन विभिन्न विशेषज्ञों ने जटिल विषयों को सरल भाषा में समझाया। डॉ. जोगेंदर कुमार ने बताया कि हर असामान्य हरकत दौरा (फिट) नहीं होती जबकि कई मामलों में बिना बाहरी लक्षण के भी दिमाग में दौरे चलते रहते हैं, जो ब्रेन को नुकसान पहुंचा सकते हैं। उन्होंने नवजात देखभाल केंद्रों में लगातार ईईजी मॉनिटरिंग की आवश्यकता पर जोर दिया।
जन्म के शुरुआती दिनों में ब्लड शुगर का कम होना बेहद खतरनाक
प्रो. नवीन सांख्यान ने चेताया कि जन्म के शुरुआती दिनों में ब्लड शुगर का कम होना बेहद खतरनाक हो सकता है और ऐसे बच्चे आगे चलकर जिद्दी मिर्गी के शिकार हो सकते हैं। वहीं, डॉ. नवीन जैन ने हाई-रिस्क नवजातों के लिए नियमित और योजनाबद्ध फॉलोअप की जरूरत बताई, ताकि विकास संबंधी समस्याओं की समय पर पहचान हो सके। डॉ. भारती शर्मा ने गर्भावस्था के दौरान सावधानियों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि समय से पहले डिलीवरी की आशंका में मैग्नीशियम सल्फेट और स्टेरॉयड इंजेक्शन जैसे उपाय नवजात के मस्तिष्क को सुरक्षित रखने में सहायक हैं।
नवजातों में ब्रेन स्ट्रोक के कारण, जांच और इलाज के विकल्पों पर चर्चा
डॉ. साजन सैनी ने प्रीमैच्योर बच्चों में ब्रेन ब्लीड के बाद होने वाली हाइड्रोसेफेलस समस्या और उसके उपचार के अंतरराष्ट्रीय मानकों की जानकारी दी। वहीं, डॉ. बिजयलक्ष्मी बेहरा ने नवजातों में ब्रेन स्ट्रोक के कारण, जांच और इलाज के विकल्पों पर चर्चा करते हुए बताया कि कुछ मामलों में हेपेरिन और एस्पिरिन जैसी दवाओं का भी उपयोग किया जाता है।