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बच्चों को PGI दे रहा मधुमेह से जीतने का हौसला

Sun, 20 Apr 2014 05:12 PM IST
आशीष वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
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टाइप वन डायबिटीज से पीड़ित दस वर्षीय अग्रिम के पैरेंट्स को पिछले साल ही पता चला कि उनका बच्चा एक गंभीर बीमारी से पीड़ित है। अग्रिम को अब रोजाना इंसुलिन के तीन से चार डोज दिए जाते हैं। उसके दर्द का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है, लेकिन उसके मन में बीमारी का डर परेशान कर रहा था।
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वह सोचता था कि इस बीमारी से सिर्फ वही पीड़ित है और थोड़ा गुमसुम रहता था। पीजीआई के इंडोक्रिम्नोलॉजी के डाक्टर अनिल भंसाली व संजय बडाडा को जब इस बारे में पता चला तो उन्होंने एक एनजीओ अदिति के साथ मिलकर ऐसे बच्चों को बीमारी से जूझने के लिए तैयार करने की एक योजना बनाई।

दो साल की लगातार मेहनत का नतीजा यह हुआ कि अग्रिम आज खेलता है। ट्रैवलिंग करता है और स्कूल जाता है। अग्रिम जैसे करीब 100 बच्चे हैं, जिन्हें देखने के बाद आप यकीन नहीं करेंगे कि वे डायबिटिज से पीड़ित हैं।
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पीजीआई के डाक्टर हर महीने इन बच्चों के साथ एक्टीविटीज करते हैं। डाक्टर पैरेंट्स बनकर उन्हें हर वो चीज सिखा रहे हैं, जो उनकी जिंदगी के लिए जरूरी है। शनिवार को बच्चे डाक्टरों के साथ छत्तबीड़ जू घूमने गए और खूब लुत्फ उठाया।

इसलिए बच्चों के साथ मनाया ग्रुप
1.बच्चों को न लगे कि उन्हें ही सिर्फ बीमारी है
2.पीड़ित बच्चे दोस्त बने और अपनी बातें शेयर करे
3.यह भावना बनाना कि डायबिटीज के बाद जिंदगी खत्म नहीं होती
4. खेलने, कूदने और घूमने से बीमारी में कोई फर्क नहीं पड़ता
5. आत्मविश्वास बनाना, ताकि आगे की जिंदगी बेहतर बना सके

पीड़ित बच्चों व पैरेंट्स को क्या फायदा हुआ
1.इंसुलिन कितनी और कैसे लेनी है इसका पता चला
2.बच्चों और पैरेंट्स का कांफिडेंस लेवल बढ़ा
3.खाने-पीने की चीजों के बारे में पता चला
4.इंसुलिन से कोई खतरा नहीं होता, इसका पता चला
5.बच्चों के मन से डायबिटीज नाम का डर खत्म

क्या है टाइप वन डायबिटीज
यह बचपन में या किशोर अवस्था में अचानक इंसुलिन के उत्पादन की कमी होने से पैदा होने वाली बीमारी है। इसमें इंसुलिन हॉर्मोन बनना पूरी तरह बंद हो जाता है। ऐसा किसी एंटीबॉडी की वजह से बीटा सेल्स के पूरी तरह से काम करना बंद करने से होता है। ऐसे में शरीर में ग्लूकोज की बढ़ी हुई मात्रा को कंट्रोल करने के लिए इंसुलिन के इंजेक्शन की जरूरत होती है। इसके मरीज काफी कम होते हैं।

क्या कहते हैं परिजन
- जब से पीजीआई के डाक्टरों का साथ मिलता है, तब से मेरी और मेरे बेटी जिंदगी बदल गई है। ट्रैवलिंग के दौरान पता चला कि बच्चों को लंच में क्या देना चाहिए। यदि शुगर बढ़ जाए तो क्या करना चाहिए।
श्वेता, अग्रिम की मां, निवासी मोहाली

- रेगुलर एक्टीविटीज से हम लोग भूल गए हैं कि घर में किसी को डायबिटीज है। इंसुलिन देने को एक रुटीन का हिस्सा मान लिया है। डाक्टरों के बराबर संपर्क में रहने से हमे कई फायदे हुए हैं।
अमृत की बेटी सुकन्या निवासी मोहाली

- डाक्टरों के साथ जुड़ने के बाद एक बात तो पता चल गई कि डायबिटीज के बाद भी एक जिंदगी है। अब इस बीमारी से लड़ने नहीं बल्कि जीतने का कांफिडेंस मुझमें और मेरी बेटी में आ गया है।
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अंशु, खुशी की मां, सेक्टर 23 चंडीगढ़ निवासी
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