चंडीगढ़। फर्जी दस्तावेज दिखाकर पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश करने वाले छह नाबालिगों की तीन साल की सजा को सीबीआई अदालत ने एक साल में बदल दिया है। यह फैसला इस शर्त पर सुनाया गया कि वह सामुदायिक सेवा करेंगे।
वर्ष 2010 में सीबीआई ने छह नाबालिग समेत 11 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था। आरोपी निशिकांत आर्या के साथ मिलकर सभी ने झूठे नेपाल सिटीजन सर्टिफिकेट दिखाकर पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज (पेक) में धोखे से प्रवेश किया था। 2010-11 एकेडमिक सेशन के लिए डायरेक्ट एडमिशन ऑफ स्टूडेंट एब्रॉड स्कीम (डीएएसए) के तहत सीधे प्रवेश के लिए झूठे दस्तावेज दिखाए गए थे। जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने 6 नाबालिगों के खिलाफ चार्जशीट पेश की थी जबकि अन्य पांच आरोपियों से संबधित सुनवाई न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास लंबित है, जिसे पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने रोक दिया है। जांच में सामने आया कि नाबालिग भारत के नागरिक हैं और उन्होंने गलत तरीके से नेपाल के नागरिक होने का दस्तावेज दिखाकर पेक की एडमिशन प्रक्रिया में हिस्सा लिया। इस दौरान यह भी खुलासा हुआ कि नाबालिगों ने मध्यस्थ निशिकांत आर्या को कॉलेज में प्रवेश दिलाने के लिए राशि का भुगतान भी किया था। एक साल से ज्यादा आरोपियों ने पढ़ाई की। 14 नवंबर, 2018 को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471 आर / डब्ल्यू 120 बी के तहत सभी को 3 साल की सजा सुनाई थी। साथ ही 600 रुपये भी जुर्माना लगाया था। बाद में इन नाबालिगों ने सीबीआई अदालत में अपना बयान दिया और अपने अपराध को स्वीकार किया। सीबीआई न्यायाधीश सुशील कुमार गर्ग ने तीन साल की सजा को एक साल कर उन्हें समुदाय की सेवा करने का आदेश दिया है। एक नाबालिग एमबीबीएस है उसे अस्पताल में मरीजों की सेवा करने का निर्देश दिया गया है।