पंजाब की कृषि में विविधता न लाई गई, तो आने वाले समय में जलस्तर और नीचे चला जाएगा और यहां रेगिस्तान जैसी स्थिति पैदा हो जाएगी। पंजाब में हर साल भूमिगत जल 3 से 5 फीट नीचे जा रहा है। धान की खेती इसका बड़ा कारण है। दूसरी, तरह कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि ईमानदारी से प्रयास किए जाएं, तो धान की सीधी बिजाई और नानक खेती से आने वाले भूजल संकट से बचा जा सकता है।
लुधियाना के जगराओं से संबंध रखने वाले डॉ. अमरीक सिंह गिल कहते हैं कि सीधी बिजाई के कई फायदेे हैं। इसमें झाड़ ज्यादा है, आधे पानी की बचत होती है, कीटनाशकों व खाद का इस्तेमाल भी कम करना पड़ता है। धान को जितना देर से लगाएंगे, उतना ज्यादा फायदा होगा, लेकिन इससे फसल को सूखने में ज्यादा समय लगता है और नमी ज्यादा होने के कारण आढ़ती फसल खरीदने में आनाकानी करते हैं। फिर भी हमें किसानों को देर से धान लगाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। अब कई ऐसी मशीनें आ गई हैं, जिससे सीधी बिजाई आसान हो गई है।
पंजाब में 1 जून से धान की रोपाई शुरू हो गई। पटियाला के गांव सियुना के जतिंदर सिंह कहते हैं कि हम सीधी बिजाई करके आने वाली पीढ़ी के लिए भूजल बचा सकते हैं। सरकार इस तकनीक को प्रोत्साहित कर रही है। धान की 1401 और 1692 किस्में सीधी बिजाई के लिए मुफीद हैं।
जतिंदर सिंह अकेले नहीं हैं, जो इस तकनीक से खेती कर रहे हैं, लेकिन पंजाब में अभी इस तकनीक को अपनाने वाले किसानों की संख्या 6 से 7 प्रतिशत ही है। कृषि विशेषज्ञ डॉ. विनोद कुमार चौधरी के अनुसार 90 से 92 प्रतिशत किसान अब भी धान की फसल लेने के लिए पारंपरिक तकनीक ही अपना रहे हैं, जबकि सीधी बिजाई व नानक खेती से भूजल संकट का समाधान किया जा सकता है। डॉ. चौधरी के अनुसार किसानों को सही जानकारी नहीं दी जा रही। किसानों को यह समझना होगा कि धान तालाब की फसल नहीं है। इसे कम पानी में भी उगाया जा सकता है। अभी इसमें पानी की खपत सबसे ज्यादा है। वह कहते हैं कि हमें श्री गुरु नानक देव जी के संदेश- पवन गुरु, पानी पिता, माता धरत महत... का अनुसरण करना चाहिए।
पटियाला के गांव सियुना के किसान जतिंदर सिंह पिछले पांच वर्षों से अपनी 10 एकड़ जमीन पर धान की सीधी बिजाई कर रहे हैं। वह बताते हैं कि इस तकनीक से उनकी पानी की खपत आधी रह गई है। खेती का खर्च भी 20 प्रतिशत तक कम हो गया है। इतना ही नहीं, इस तकनीक का असर अगली गेहूं की फसल पर भी पड़ने लगा है, जिससे पैदावार बढ़ गई है।
पंजाब में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। प्रदेश के 118 ब्लॉक रेड जोन में पहुंच गए हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार भूजल की उपलब्धता के लिहाज से पंजाब का 75.16 प्रतिशत हिस्सा रेड जोन में है। सिर्फ 22 ब्लॉक ही सुरक्षित जोन में पाए गए। कुल 50175.27 स्क्वायर किलोमीटर क्षेत्र में से 35,786.32 स्क्वायर किलोमीटर क्षेत्र भूजल दोहन से बुरी तरह से प्रभावित है। देर के जिन पांच राज्यों में सबसे अधिक भूजल दोहन हो रहा है, उनमें पंजाब सबसे ऊपर है। दूसरे स्थान पर राजस्थान और तीसरे पर दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव शामिल हैं। चौथे नंबर पर हरियाणा और पांचवें पर दिल्ली है।
तरनतारन के गांव रता गुदा के किसान गुरबचन सिंह मानना है कि पारंपरिक तकनीक को अपनाकर भी पानी की बचत की जा सकती है। इसे एक दम नहीं छोड़ सकते। बड़ी संख्या में श्रमिक इससे जुड़े हुए हैं। अगर अच्छे तरीके से निराई की जाए तो कीटनाशकों की जरूरत नहीं है। हमें प्राकृतिक खेती के मॉडल को अपनाना चाहिए। पराली को आग न लगाकर इसे संभाल कर रखे और इसका इस्तेमाल खेत में करें। इससे खेत में नमी बनी रहेगी और पानी की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ेगी। गुरुओं ने हमें खेती का जो तरीका बताया है, हमें उसे अपनाना चाहिए।
विधि- पानी की खपत (प्रति एक किलो उपज)- पैदावार (प्रति एकड़)