चंडीगढ़। ऑपरेशन थिएटर में जहां एक मिलीमीटर की चूक भी मरीज की जिंदगी बदल सकती है और हर सेकेंड बेहद तनावभरा होता है, वहीं पीजीआई के वरिष्ठ न्यूरोसर्जन एवं अतिरिक्त प्रोफेसर डॉ. मंजुल त्रिपाठी खुद को शांत रखने के लिए किशोर कुमार और मन्ना डे के गीत गुनगुनाते हैं। दुनिया के चुनिंदा न्यूरोसर्जनों में शामिल डॉ. त्रिपाठी की पहचान सिर्फ कुशल सर्जन की नहीं, बल्कि साहित्य और संगीत से गहरा जुड़ाव रखने वाले संवेदनशील चिकित्सक की भी है।
डॉ. त्रिपाठी का कहना है कि चिकित्सा का पेशा जितना चुनौतीपूर्ण है, मानसिक संतुलन बनाए रखना उतना ही जरूरी है। लगातार जटिल सर्जरी और व्यस्त दिनचर्या के बीच जैसे ही कुछ पल मिलते हैं, वह पुराने सदाबहार गीतों में सुकून तलाशते हैं। उनके अनुसार संगीत तनाव कम करता है, मन को शांत रखता है और कठिन परिस्थितियों में भी एकाग्रता बनाए रखने में मदद करता है। परिवार के साथ समय मिलने पर वह बेटे के साथ गिटार पर अपने पसंदीदा गीत भी गाते हैं। उनके लिए यह केवल शौक नहीं, बल्कि मानसिक तनाव से बाहर निकलने का सबसे प्रभावी माध्यम है। चिकित्सा विज्ञान को आम लोगों तक पहुंचाने की दिशा में भी उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने प्रसिद्ध न्यूरोसर्जन प्रोफेसर एंटोनियो डी सैलेस की पुस्तक का हिंदी अनुवाद ''''क्रोध'''' शीर्षक से किया, ताकि जटिल चिकित्सा विषयों को हिंदी भाषी पाठक भी आसानी से समझ सकें।
साहित्य और संगीत के बिना जीवन अधूरा
डॉ. त्रिपाठी का मानना है कि डॉक्टर केवल विज्ञान से नहीं, बल्कि संवेदनाओं से भी बेहतर बनता है। साहित्य और संगीत व्यक्ति को भीतर से समृद्ध करते हैं और मरीजों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाते हैं। उनका संदेश है कि व्यस्त और तनावपूर्ण जीवन के बीच हर व्यक्ति को ऐसा कोई माध्यम जरूर अपनाना चाहिए, जो उसे मानसिक रूप से तरोताजा रखे। डॉ. मंजुल त्रिपाठी को वर्ष 2026 में वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ न्यूरोसर्जिकल सोसाइटीज की रेडियोसर्जरी कमेटी का चेयर नियुक्त किया गया।