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Chandigarh News: छोटे किसान के लिए खेती का संकट अब भी बरकरार

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-उत्तर भारतीय ग्रामीण समाज के बदलावों पर पंजाबी यूनिवर्सिटी का अहम शोध
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अमर उजाला ब्यूरो
पटियाला। उत्तर भारतीय ग्रामीण समाज में आए गहरे सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बदलावों पर पंजाबी यूनिवर्सिटी के अंग्रेजी विभाग में किए गए एक शोध ने खेती के मौजूदा संकट की गंभीर तस्वीर पेश की है। शोध में निष्कर्ष निकाला गया है कि निम्न तबके के किसानों के लिए खेती का संकट आज भी जारी है, जो बस्तीवादी नीतियों, हरित क्रांति, मशीनीकरण और बाजार के दबाव से गहराई से जुड़ा हुआ है।
यह शोध डॉ. गुरप्रीत सिंह द्वारा सुपरवाइजर डॉ. सुशील कुमार के मार्गदर्शन में किया गया। इसमें वर्ष 1936 से 1985 के बीच प्रकाशित पंजाबी और हिंदी साहित्य के पांच प्रमुख उपन्यासों के आधार पर तीन पीढ़ियों के ग्रामीण जीवन का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है।
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इन उपन्यासों को बनाया गया आधार
शोध में प्रेमचंद का गोदान, संत सिंह सेखों का लहू मिट्टी, गुरदयाल सिंह का मढ़ी दा दीवा, करमजीत सिंह कुस्सा का रोही बियाबान और राम सरूप अणखी का कोठे खड़क सिंह शामिल हैं। इन रचनाओं के माध्यम से हरित क्रांति से पहले और बाद के ग्रामीण समाज में आए बदलावों को गहराई से समझने का प्रयास किया गया है।
खेती संकट के कई आयाम
शोध के अनुसार जमीन के मालिकाना हक में बदलाव, सूदखोरी और शोषण, पारंपरिक पारिवारिक ढांचे का टूटना, जेंडर भूमिकाओं में परिवर्तन, मशीनीकृत खेती के सामाजिक प्रभाव और शिक्षा के जरिए उभरती नई चेतना ने ग्रामीण जीवन की दिशा बदल दी। बाजार आधारित खेती ने छोटे और सीमांत किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव डाला, जिससे असमानताएं और गहरी हुईं।
सैद्धांतिक ढांचा
शोध में मार्क्सवादी और पोस्ट-मार्क्सवादी दृष्टिकोण अपनाया गया है। एंटोनियो ग्राम्स्की, टेरी ईगलटन, मैक्स वेबर, लुई अल्थसर और रेमंड विलियम्स जैसे विचारकों के सिद्धांतों के संदर्भ में ग्रामीण समाज का विश्लेषण किया गया।
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शोध के प्रमुख निष्कर्ष
-निम्न किसानों के लिए खेती लाभकारी नहीं रही।
-मशीनीकरण से सामाजिक रिश्तों में बदलाव।
-पारंपरिक मूल्यों का क्षरण और रिश्तों का वस्तुकरण
-बढ़ती सामाजिक-आर्थिक खाई।
उम्मीद की झलक भी
डॉ. सुशील कुमार के अनुसार, निराशाजनक हालात के बावजूद कुछ उपन्यासों में युवा पीढ़ी द्वारा पारंपरिक बंदिशों को चुनौती देने और बदलाव की उम्मीद दिखाई देती है। शोध यह भी रेखांकित करता है कि खेती और मानवीय मूल्यों में आए बदलावों को दर्ज करने में साहित्य एक सशक्त माध्यम है। तुलनात्मक दृष्टिकोण इस शोध की बड़ी विशेषता है, जो इसे इस क्षेत्र के अन्य अध्ययनों से अलग बनाता है। पंजाबी यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉ. जगदीप सिंह ने शोध टीम को बधाई देते हुए उम्मीद जताई कि यह अध्ययन उत्तर भारतीय ग्रामीण समाज को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देगा।
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