एक वरिष्ठ पूर्व आईएएस ने कहा कि वर्तमान परिस्थिति में अलग प्रशासक की नियुक्ति की संभावनाएं काफी ज्यादा हैं। वर्ष 2016 में भाजपा और अकाली दल का गठबंधन था। तत्कालीन सीएम बादल की बात केंद्र को माननी पड़ी, लेकिन अब गठबंधन टूट चुका है और न ही अकाली दल सत्ता में है। इसके अलावा पंजाब में अगले वर्ष चुनाव भी हैं।
तालमेल बनाने के लिए ही पंजाब के राज्यपाल को दी गई थी चंडीगढ़ की कमान
वर्ष 1952 से 1966 तक चंडीगढ़ पंजाब की राजधानी थी और मुख्य आयुक्त स्थानीय प्रशासन का नेतृत्व करता था। जब पंजाब का विभाजन हुआ तो केंद्र सरकार ने एक नवंबर 1966 को चंडीगढ़ को एक केंद्रशासित प्रदेश बना दिया। यहां का प्रशासन केंद्र सरकार के अधीन काम करने लगा, लेकिन मुख्य आयुक्त की व्यवस्था को जारी रखा गया। यह व्यवस्था 31 मई 1984 तक जारी रही। वर्ष 1984 में पंजाब आतंकवाद और दंगों से जूझ रहा था तो चंडीगढ़ में भी हालात बेहद खराब थे।
पंजाब और चंडीगढ़ में तालमेल बनाने के लिए ही चंडीगढ़ की कमान पंजाब के राज्यपाल को प्रशासक के तौर पर सौंपी गई और मुख्य आयुक्त के पद को प्रशासक के सलाहकार के तौर पर बदल दिया गया। इसके साथ ही सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करने के लिए आईजी और एसएसपी के पदों पर भी पंजाब के अधिकारियों को नियुक्त किया गया था। दंगों से निपटने के बाद आईजी का पद तो वापस लेकर यूटी कैडर से भरा जाने लगा, लेकिन एसएसपी आज भी पंजाब का ही बनता है।
सिर्फ चंडीगढ़ के लिए अगर प्रशासक की नियुक्ति होती है तो यह चंडीगढ़ के लोगों के लिए अच्छा होगा। हालांकि, बड़ा मुद्दा डेपुटेशन का भी है। पंजाब और हरियाणा के अधिकारी चंडीगढ़ में काम करते हैं, लेकिन चंडीगढ़ का कोई अपना कैडर नहीं है। - अरुण सूद, प्रदेश अध्यक्ष, भाजपा
चंडीगढ़ में मुख्य सचिव के पद को बहाल करना चाहिए, क्योंकि उस दौरान स्थितियां ज्यादा बेहतर थीं। शहर का विकास करना है कि मेयर को ताकत देनी होगी। एमसी एक्ट में संशोधन कर मेयर इन कांउसिल बनाया जाना चाहिए। इसमें मेयर के साथ दो पार्षद हों, जिन्हें विभाग दिए जाएं और वह काम करें। - पवन कुमार बंसल, पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री (कांग्रेस)