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दहेज प्रथा की कुरीतियों पर नाटक, ‘किथे जावां की करां’

Tue, 01 Mar 2016 10:25 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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टैगोर थिएटर में सोमवार को किथे जावां की करां नाटक का मंचन किया गया। इस पंजाबी हास्य नाटक को चंडीगढ़ आर्ट थिएटर ग्रुप के कलाकारों ने पेश किया। शाम जुनेजा लिखित और रणजीत रॉय के निर्देशन में कलाकारों ने इस नाटक के माध्यम से समाज की कुरीतियों पर व्यंग्य किया। नाटक की शुरुआत मल्होत्रा परिवार से होती है।
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उनके दो बेटे हैं विजय और भल्ला। विजय एक होनहार लड़का है और पढ़ाई पूरी करने के बाद काम की तलाश में मुंबई चला जाता है। वहीं दूसरी तरफ भल्ला एक ख्याली पुलाव पकाने वाला लड़का है जो कवि बनने के सपने देखता है और खुद को कवि समझने लगता है।  

कुछ दिन बाद विजय घर वापस आ जाता है। इसी दौरान उसकी मां की सहेली की बेटी कविता भी उनके पास कुछ दिन रहने के लिए आती है। विजय और कविता आपस में प्यार करने लग जाते हैं। वहीं भल्ला भी कविता की ओर आकर्षित होता है और उससे शादी करने के बारे में सोचता है। इसी बीच नाटक में मल्होत्रा के दोस्त मेजर चोपड़ा की एंट्री होती है। वह उन्हें याद दिलाते हैं कि मल्होत्रा ने वादा किया था कि वह अपने बेटे की शादी उनकी लड़की से करेंगे।
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मल्होत्रा मेजर से बहुत ज्यादा दहेज की मांग करते हैं। इस बात को विजय और कविता दोनों सुन लेते हैं। दहेज का नाम सुनने के बाद मेजर चोपड़ा की मल्होत्रा के साथ कहासुनी हो जाती है और वह चले जाते हैं। इसकी जानकारी मिलते ही कविता और विजय परेशान हो जाते हैं। इसके बाद किसी को बिना बताए कोर्ट में शादी कर लेते हैं।

इसी बीच कविता के परिवार वाले मल्होत्रा के घर कविता के रिश्ते की बात लेकर आते हैं तो कविता और विजय दोनों इंकार कर देते हैं। इस पर भल्ला बहुत खुश होता है कि कविता से विजय नहीं तो मैं शादी करूंगा। जब भल्ला से बात शुरू होती है तो विजय और कविता इस बात की जानकारी देते हैं कि उन्होंने दहेज की बात सुनकर पहले ही शादी कर ली है। इस बात को सुनकर सारा परिवार हंस पड़ता है  इस प्रकार नाटक का अंत हो जाता है।
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