फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बेमिसालः लेखक को खोजकर किताबें छपवाते हैं मोता सिंह सराय, बांट दी 17 करोड़ की किताबें

Tue, 17 Mar 2020 02:45 PM IST
खुशबू गोयल सुरिंदर पाल, जालंधर
विज्ञापन
मोता सिंह सराय - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
किताबें अपने आप में ही एक ख़ूबसूरत शब्द है, जिसके मायने बहुत खास हैं। कई बार महबूब का चेहरा किताब होता है तो कई बार समाज ही किताब बन जाता है, कुल मिलाकर वो तमाम चीज़ें जिन्हें आप समझकर इल्म हासिल कर सकते हैं, वह किताब से ही संभव है। कागज में दब के मर गए कीड़े किताब के दीवाना बेपढ़े, लिखे मशहूर हो गया। किताबों के प्रति ऐसी दीवानगी का जीता जागता उदाहरण है यूके के सरदार मोता सिंह सराय... जो अब तक 17 करोड़ की किताबों को छपवाकर बांट चुके हैं।
विज्ञापन


मकसद सिर्फ एक ही है कि आने वाली पीढ़ी को अपना इतिहास ट्रांसफर करना... उन लेखकों को खोज निकालना जिनके अल्फाज अभी तक बाहर नहीं आए हैं। किताबों से बेपनाह मोहब्बत करने वाले मोता सिंह सराय इन दिनों भारत के दौर पर हैं और उन्होंने यहां आकर भी अपना मिशन सिर्फ किताबों तक ही सीमित रखा। नकोदर के निकट छोटे से गांव के रहने वाले मोता सिंह सराय ने मास्टर डिग्री जालंधर के खालसा कॉलेज से की थी। बाद में सिटी ऑफ लंदन कॉलेज में उच्च शिक्षा के लिए चले गए और वहीं पर बस गए।

1986 से लेकर 1993 तक लगन से मेहनत की और यूके की सुप्रीम कोर्ट की वकील रशमिंदर से शादी रचा ली। दिल में एक कसक थी कि पंजाब के इतिहास व साहित्य और पुरातन शायरी को जिंदा रखना है। 1994 में पंजाबी सथ के साथ जुड़ गए, जिनका मिशन पंजाबी इतिहास को पन्नों पर लाकर लिटरेचर को प्रमोट करना था। मोता सिंह सराय ने 2000 में यूरोपियन पंजाबी सथ को शुरू किया। अब उनकी जिंदगी का असली सफर शुरू हुआ, जिसकी उनको तलाश थी। पाकिस्तान में छूट गए पंजाब यानी लहंदा और चढ़दा पंजाब के कवियों से संपर्क किया।
विज्ञापन


तीन पुस्तकें छपर्वाइं, जिसमें 50-50 कवि पाकिस्तान और भारत पंजाब के तलाशे गए, उनकी कविताओं की संयुक्त पुस्तकें छपवाई गईं। नाम थे... जुल्मों कूक गई असमानी, अंबर काला इत विद होया व दर्द मंदा दी माड़ी थी। इन पुस्तकों में कविताओं में भारत पाक बंटवारे का पूरा दर्द था। यूरोप में बसे पंजाबी साहित्यकारों, लेखकों को जोड़कर एक लंबा चौड़ा काफिला तैयार कर लिया। ऑस्ट्रेलिया के ब्रिसबेन, एडीलड, सिडनी, कनाडा के टोरंटो, वैंकुवर, अमेरिका के न्यूयार्क, कैलेफोर्निया व खाड़ी देशों में इकाईयां स्थापित की। पूरे विश्व में यूरोपियन सथ की 43 यूनिट स्थापित की।
विज्ञापन

देश विदेशों में बैठे कवियों की रचनाएं जोड़कर तैयार करते हैं किताब...

मोता सिंह सराय में एक खास बात है कि यूरोपियन पंजाबी सथ के बैनर के अधीन जो किताब भी वह छपवाते हैं, उसमें अधिक से अधिक लेखकों व कवियों को शामिल करते हैं। माए न माए.. किताब में 239 कविताओं को शामिल किया गया वहीं धीयां निमानियां में 401 कवियों की रचना को लिया गया।

15 हजार किताबें हाथ से बांटीं
श्री गुरुनानक देव जी के 550वें प्रकाशोत्सव पर यूके से खास तौर पर सुल्तानपुर लोधी पहुंचे मोता सिंह ने श्री गुरुनानक देव पर लिखी 15 हजार किताबों को बांटा। उन्होंने किसी एनजीओ की सहायता नहीं ली बल्कि हाथ से इन किताबों को संगत में वितरित किया।

अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के वीसी की किताब को 20 साल बाद छपवाया...
मोता सिंह सराय व यूोरियन पंजाबी सथ का मुख्य मकसद उन रचनाओं व लेख को आगे लाना भी है, जो छिपे हुए हैं। अतीत में जाते हुए मोता सिंह बताते हैं कि अलीगढ़ के वीसी खालिद अहमद निजाम ने बाबा फरीद की जीवनी व उन पर रिसर्च को अंग्रेजी में लिखा था। उन्होंने 1991 में इसके पंजाबी अनुवाद व छापने के लिए तत्कालीन पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला को भेजा था। बाबा फरीद को पंजाबी में अच्छी तरह पढ़ा जा सकता है, निजाम के मन की इच्छा थी कि किताब पंजाबी में जरूर छपनी चाहिए।

लेकिन 20 साल तक किताब अनुवाद के लिए पंजाबी यूनिवर्सिटी में पड़ी रही। किसी ने उसे नहीं छापा। जब यह बात मोता सिंह सराय के ध्यान में आई तो उन्होंने बाबा फरीद की जीवनी व रिसर्च को पंजाबी में छापा और बाकायदा किताब में शुरूआती पन्नों पर उन पत्रों की प्रतियां भी छापीं, जो निजाम ने अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के वीसी रहते हुए पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के वीसी को लिखी थीं। इसमें किताब को पंजाबी में छापने का अनुरोध किया हुआ था।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें