चंडीगढ़। थिएटर फॉर थिएटर की ओर से आयोजित 15वें विंटर नेशनल थिएटर फेस्टिवल की 21वीं शाम सुर संगीत के नाम रही। नॉर्थ जोन कल्चरल सेंटर पटियाला के सहयोग से आयोजित की गई। संगीत की इस महफिल में दिल्ली से आए देश के चर्चित बांसुरी वादक पंडित चेतन जोशी और उनकी टीम ने कला प्रेमियों को अपनी बांसुरी की धुनों से मंत्रमुग्ध कर दिया। देश विदेश में हजारों प्रस्तुतियां कर अपनी बांसुरी की धुन से दुनिया का दिल जीत चुके पंडित चेतन जोशी ने अपने कार्यक्रम की शुरुआत में श्रोताओं से बातचीत में कहा कि बांसुरी विश्व के सबसे पुराने वाद्यों में से एक है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में आज बांसुरी को जो स्थान फिर से मिला है, उसका श्रेय उन्होंने अपने दादा गुरु पंडित पन्नालाल घोष को दिया। पंडित चेतन जोशी भारत के अग्रणी बाँसुरी वादकों में से एक हैं और कई उपाधियों से सम्मानित भी हैं।
पंडित जोशी ने अपने वादन का प्रारंभ राग सरस्वती में आलाप से किया। इसमें उन्होंने अति मंद्र सप्तक बजाने का भी अद्वितीय प्रयोग किया। आलाप के बाद उन्होंने लयबद्ध आलाप यानी जोड़ और झाले में प्रवेश किया। जिसमें उनके साथ पखावज पर वाराणसी से आए प्रसिद्ध पखावज वादक पंडित अंकित पारिख ने साथ दिया। आलाप-जोड़-झाला के बाद उन्होंने विलंबित रूपक ताल में एक गत रखी, जिसमें रागदारी और कोमलता का समावेश दिखाई दिया। तबले पर दिल्ली से पधारे प्रख्यात तबला वादक पंडित प्रदीप चटर्जी ने उनका साथ दिया। मध्य लय की बंदिश तीन ताल में निबद्ध थी। इस में बंदिश की आमद का उन्होंने विद्वतापूर्ण प्रदर्शन किया। इसमें तबला और पखावज दोनों एक साथ बज रहे थे। लय और स्वर के इस सामंजस्य के कारण श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए थे। श्रोताओं की फरमाइश पर पंडित चेतन जोशी ने एक लोक धुन सुना कर अपने अविस्मरणीय कार्यक्रम का समापन किया। इसका कलाकारों ने खड़े होकर तालियों से स्वागत किया।