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सुखदेव ढींढसा की पार्टी से सुखबीर बादल की मुश्किलें बढ़ीं, शिअद (टकसाली) का अस्तित्व खतरे में

Wed, 08 Jul 2020 11:47 AM IST
खुशबू गोयल अमर उजाला, अमृतसर
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सुखबीर बादल - फोटो : ANI
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सांसद सुखदेव सिंह ढींढसा ने अपने समर्थकों के साथ शिरोमणि अकाली दल का गठन कर पंजाब की राजनीति में बादल परिवार को एक चुनौती देने का प्रयास किया है। ढींढसा एसजीपीसी व 2022 के विधानसभा चुनाव में शिअद (बादल) को कितना राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकते हैं, यह तो समय तय करेगा। लेकिन अब पूर्व सांसद रंजीत सिंह ब्रह्मपुरा की शिअद (टकसाली) के अस्तित्व कमजोर पड़ सकता है।
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इस पार्टी की घोषणा करते समय कई ऐसे नेता भी मौजूद थे, जो ब्रह्मपुरा द्वारा घोषित शिअद (टकसाली) की स्थापना की समय भी थे। पिछले कुछ समय से ब्रह्मपुरा और ढींढसा के बीच वैचारिक मतभेदों को दूर करने का प्रयास कर रहे और टकसाली अकाली दल की सीनियर नेता सेवा सिंह सेखवां भी मौजूद थे। ब्रह्मपुरा के समर्थन में आए व अपनी नई पार्टी बनाने वाले दिल्ली कमेटी के पूर्व अध्यक्ष मंजीत सिंह जीके भी ढींढसा के समर्थन में आ गए हैं।

ब्रह्मपुरा की कई बैठकों में मौजूद रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री बलवंत सिंह रामूवालिया भी ढींढसा के साथ थे। इससे स्पष्ट है कि शिअद (टकसाली) का अस्तित्व कमजोर पड़ जाएगा। शिअद (टकसाली) के संस्थापक सदस्य पूर्व सांसद डॉ. रत्न सिंह अजनाला ने कहा कि ढींढसा को नई पार्टी स्थापित करने के स्थान पर शिअद (ट) की अगुवाई करनी चाहिए थी।
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सुखबीर बादल के लिए बढ़ी चुनौती, मात्र दो साल में दो शिअद की स्थापना

सुखबीर सिंह बादल को शिअद (बादल) की बागडोर सौंपने के लिए जिस नेता ने उनके नाम का अनुमोदन कर जैकारे लगाए थे, अब उन्हीं ढींढसा ने सुखबीर के लिए नई राजनीतिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। मात्र दो वर्ष के अंतराल में शिअद (बादल) से बागी हुए पंथक नेताओं ने दो शिअद की स्थापना कर दी है।

स्थापना की एक शताब्दी के दौरान शिअद कई बार टूटा, कई बार अलग-अलग गुट एक साथ आए। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद प्रकाश सिंह बादल के बनाए अकाली दल ने न केवल तीन बार सत्ता हासिल की, बल्कि तीन बार एसजीपीसी में भी अपना कब्जा बरकार रखा। हालांकि सुखबीर सिंह बादल की कार्यप्रणाली को लेकर अकाली दल के सीनियर नेताओं द्वारा किए गए विरोध के बाद बने दो नए अकाली दलों को जमीनी वर्करों का समर्थन मिल पाना कोई आसान काम नहीं है।

अकाली दल की लीडरशिप पार्टी वर्कर के बीच यह प्रचार कर रही है 2022 के विधानसभा चुनाव में शिअद की सरकार की स्थापना होनी है। वर्कर सत्ता पर काबिज होने के लालच में भी सुखबीर बादल के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं लेकिन बेअदबी व बहिबल कलां कांड ने सुखबीर बादल की पंथक छवि को बड़ा नुकसान पहुंचा है। इसी मुद्दे ने शिअद को 2017 के विधानसभा चुनाव में करारी हार दी थी।
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