पूर्व केंद्रीय मंत्री व सांसद सुखदेव सिंह ढींढसा, नई पार्टी शिरोमणि अकाली दल के कारवां को लगातार बढ़ाते हुए अकाली की सियासत में वर्चस्व कायम करने में जुट गए हैं। ढींढसा की ओर से बादल परिवार के गृह जिलों में सेंधमारी करके रूठे व नजरअंदाज नेताओं को अपने साथ जोड़ा जा रहा है। साथ ही माझा व दोआबा में कई नेताओं को नए दल में शामिल कर लिया है। सांसद ढींढसा का पहला निशाना एसजीपीसी चुनाव होंगे।
गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी, डेरा मुखी को माफी और खेती अध्यादेश के मुद्दे उठाकर बादल परिवार को घेरना उनके प्राथमिक एजेंडे में है, लेकिन सांसद ढींढसा के समक्ष पंथक मुद्दों और पंजाब के हितों के दरमियान संतुलन बनाना बड़ी चुनौती होगा। सियासी जानकारों का मानना है कि पंथक सोच के अलावा तमाम पंजाबियों के हितों पर पहरा देने वाला सियासी दल ही पंजाब की राजनीति में पांव जमा सकेंगे।
पंथक मुद्दों के दम पर सिखों की सिरमौर संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के चुनाव में कड़ी टक्कर दी जा सकती है, जबकि पंजाब के हितों की रक्षा से जनमत हासिल किया जा सकता है। इन दोनों पहलुओं के दरमियान संतुलन बनाना ही सांसद ढींढसा के समक्ष किसी बडे़ चैलेंज से कम नहीं होगा। जानकार मानते हैं कि अगर सांसद ढींढसा इन पहलुओं में संतुलन बनाने में सफल रहे तो भविष्य में किसी अन्य राजनीतिक दल से गठबंधन करने के विकल्प भी सुरक्षित रहेंगे। समय की नजाकत को भांपते हुए ढींढसा वक्त आने पर किसी भी दल के साथ समझौता कर सकते हैं।