इसके बाद मूवी व कार्टून देखने लगते हैं। फिर गेम्स आदि खेलने लगते हैं। पूरा दिन स्क्रीन पर आंखें टिकाए रहते हैं, जिससे उनकी गर्दन की मांसपेशियों में खिंचाव आता है। आंखों में जलन होती है, वहीं गुस्सा व तनाव भी हावी होता है। डॉ. मक्कड़ के अनुसार यदि किसी बच्चे से मोबाइल मांग ले तो वह ऐसे व्यवहार करता है, मानों उससे कोई कीमती वस्तु मांग ली हो।
कोरोना संकट में मोबाइल एडिक्शन की वजह से बच्चों का वजन बढ़ा है। सिर व आंखों में दर्द, मोटापे के साथ-साथ हार्ट संबंधी रोग भी उन्हें घेर रहे हैं। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। छात्र हर काम बिस्तर पर बैठकर या लेटकर करते हैं। यह स्थिति तो कोरोना वायरस से ज्यादा घातक है। बचपन में हम पाठ्यपुस्तकों में कॉमिक्स रखकर पढ़ते थे। इससे सिर्फ पढ़ाई का नुकसान होता था, शारीरिक व मानसिक रूप से हम फिट ही रहते थे। अब बच्चे पढ़ाई की आड़ में मोबाइल पर गेम्स खेल रहे हैं। उनकी प्रैक्टिकल नॉलेज खत्म हो गई है। ऑनलाइन शिक्षा आज की जरूरत है पर अभिभावकों को अपनी व्यस्तता को त्याग कर बच्चों के साथ अधिक वक्त बिताना चाहिए।