चंडीगढ़ के सेक्टर-17 के परेड ग्राउंड में लगे एग्रो-टेक इंडिया मेले में पराली पर चर्चा हुई। इस दौरान विशेषज्ञों ने कहा कि पराली एक समस्या नहीं, बल्कि एक पावर है। अगर पंजाब के किसान पराली को आग लगाने की बजाय, उसका इस्तेमाल करे तो करीब 3500 करोड़ कमा सकते हैं। इसके साथ ही न जमीन खराब होगी और न प्रदूषण होगा। विशेषज्ञों ने बताया कि कैसे कई जिलों के किसान पराली बेचकर काफी कमाई कर रहे हैं। बस जरूरत है, उस दिशा में सोचने की।
पराली पर हुई परिचर्चा में हरियाणा खेती विभाग के संयुक्त निदेशक जगमिंदर सिंह नैन, हरियाणा खेती विभाग के संयुक्त निदेशक जगदीश सिंह, पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (पीएयू) के साइंटिस्ट डॉ. महेश नारंग, एचएयू के असिस्टेंट प्रोफेसर इंजीनियर स्वप्निल, प्रोग्रेसिव किसान रमेश चौहान, पटियाला खेरी मनिया सोसाइटी के नजर सिंह मुख्य पैनलिस्ट रहे।
जगदीश सिंह ने कहा कि आज की पराली की समस्या के जिम्मेदार सभी है। शुरू से ही किसानों को सिर्फ दाना संभालने को कहा गया, पराली की किसी ने बात ही नहीं की थी। पहले से ही उन्हें बताया जाता तो स्थिति कुछ और होती। सिर्फ पराली जलाने वाले किसानों की बात हो रही है, लेकिन कितने किसानों ने पराली नहीं जलाई, उनकी कोई बात नहीं कर रहा। पंजाब में सबसे ज्यादा मशीनरी है। उन सभी का किसान इस्तेमाल कर रहे हैं। पराली कोई समस्या नहीं है, बल्कि ये किसानों की पावर है। पंजाब में करीब 200 लाख मीट्रिक टन पराली निकलती है। अगर 175 रुपये क्विंटल का रेट भी लगाएं, तो ये 3500 करोड़ का बिजनेस है। किसान इसे धीरे-धीरे समझ रहे हैं, इसलिए इस बार कई जिलों के गांवों में एक जगह भी पराली नहीं जली है। जगमिंदर सिंह नैन ने कहा कि पराली पावर है और किसानों का मित्र है। इसकी ताकत पहचानने की जरूरत है और किसान अब समझ भी रहे हैं।
पंजाब में मशीनों का इस्तेमाल बढ़ा, पराली जलाने की घटनाएं हो रहीं कम
पीएयू के साइंटिस्ट डॉ. महेश नारंग ने कहा कि पंजाब में कुल करीब 32 लाख हेक्टेयर में खेती होती है। पिछले कुछ समय में पंजाब के किसानों ने मशीनों को काफी तेजी से अपनाया है। सिर्फ पंजाब में करीब 35 हजार सुपर सीडर, 14 हजार हैप्पी सीडर और अब स्मार्ट सीडर भी काफी चल रहे हैं। इनकी वजह से पराली खेत में ही मिल जा रही है। पराली जलाने की घटनाएं भी कम हुई हैं। उन्होंने कहा कि कृषि के क्षेत्र में तकनीक तेजी से आगे बढ़ रही है। यूनिवर्सिटी ने पाया है कि जो किसान पराली नहीं जलाते हैं उनकी फसल चौथे साल 8 से 10 फीसदी ज्यादा होती है। मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन, नाइट्रोजन और फास्फोरस की मात्रा भी काफी होती है। जमीन की सेहत बढ़ती है और प्रदूषण भी कम होता है।
पराली से जब रुपये बन रहे हैं, तो जलाना क्यों: किसान रमेश
हरियाणा के फतेहाबाद से पहुंचे किसान रमेश चौधरी ने बताया कि किसान सेवा केंद्र से जुड़े हैं। करीब 90 किले पर खेती करते हैं और 2017 से लेकर आज तक एक बार भी पराली नहीं जलाई। सीआईआई फाउंडेशन और सरकार की मदद से अपना और किसानों का फायदा करा रहे हैं। पराली को लोग समस्या समझते हैं लेकिन उन्हें पता नहीं ये कितनी काम की चीज है। जब इससे रुपये कमाए जा सकते हैं तो इन्हें जलाना क्यों है। बताया कि मशीनों को लेकर आसपास के 12 गावों के लोगों को जागरूक किया है और दो साल में इन 12 गांवों में से एक भी जगह पराली नहीं जली है। किसानों को पराली के प्रति अपनी सोच बदलने की जरूरत है।