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हरियाणा रोडवेज की हड़ताल, पढ़ें अंदरुनी सच

Mon, 08 Sep 2014 12:16 PM IST
प्रवीण खुराना/अमर उजाला, झज्जर
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हरियाणा रोडवेज कर्मचारियों के प्रदेश में चक्का जाम के बाद एक बार फिर सरकार व कर्मचारी आमने-सामने हैं। प्रदेश भर में पूरी तरह से किए गए चक्का जाम ने साबित किया है कि कर्मचारियों की एकता के आगे सरकार बेबस है।
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सरकार द्वारा निजी परमिटों को अलॉट करने की शुरूआत भर से भड़की चिंगारी से दो दिन में लाखों यात्रियों को परेशानी झेलनी पड़ रही है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी विभिन्न सरकारों के समय में कर्मचारियों के आंदोलन होते रहे हैं। सरकारों ने कर्मचारियों के आंदोलन को कुचला तो कर्मचारियों ने मौका आने पर सरकार की मरोड़ निकालने में कसर नहीं छोड़ी है।

हुड्डा सरकार के इन पांच साल की बात करें तो कर्मचारी निरंतर अपनी मांगों के लिए आंदोलनरत रहे हैं। हालांकि सरकार का दावा है कि जितना इस सरकार ने कर्मचारियों के लिए किया है, उतना किसी ने नहीं किया। इसके बाद भी कर्मचारियों का आंदोलन की राह पर चलते रहना सत्ता पक्ष की भी समझ से परे है।
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चुनावी माहौल के हर कोई चाहता है मसले को भुनाना

रोडवेज के साथ प्राइवेट ऑपरेटरों को परमिट देने का मामला कोई नया नहीं है। दशकों से ये परमिट दिए जाते रहे हैं और इनका विरोध होता रहा है। सरकार प्रदेश में 3519 परमिट जारी करना चाहती है। कई वर्ष से सरकार इस प्रक्रिया को चला रही है, जबकि कर्मचारी इसका निरंतर विरोध कर रहे हैं।

इस विरोध के पीछे कारण यह है कि यूनियन मानती है कि इन परमिटों से रोडवेज का एक तरह से निजीकरण किया जा रहा है। चूंकि हरियाणा रोडवेज में आज 3800 के आसपास बसें हैं। यदि सरकार एक साथ 3519 परमिट जारी कर देती है तो प्रदेश में एक तरह से परिवहन का समानांतर बेड़ा खड़ा हो जाता है। इसी का कर्मचारी विरोध कर रहे हैं।

हरियाणा में इससे पहले जो परमिट दिए गए थे, उस समय उन रूटों पर परमिट दिए गए थे, जहां रोडवेज की बसें नहीं चलती थी। समय के साथ-साथ निजी बसों के परमिट गांव से खत्म हो गए और उन्हें सीधे रूटों पर चलाया जाने लगा। लिहाजा जिन गांवों में सरकारी बसें नहीं पहुंचती, वे आज भी इस सेवा से महरूम है।
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क्या कहते हैं रोडवेज नेता

यूनियन के प्रदेश स्तरीय नेता वीरेंद्र धनखड़ और जिले की यूनियन के नेता कर्मबीर सिंह कहते हैं यह सरकार की सोची समझी साजिश है। एक निजी बस चलने से केवल कुछ परिवारों को निजी फायदा हो सकता है, जबकि रोडवेज बस चलने से कहीं ज्यादा परिवारों को फायदा मिलता है। इसके अलावा यात्रियों की सुविधा अलग से है। इसी मसले पर जनवरी में तीन दिन की हड़ताल हो चुकी है। इससे पहले भी कई आंदोलन चलते रहे हैं, लेकिन सरकार ने इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया।  

प्रदेश के बड़े आंदोलन
प्रदेश में बड़े आंदोलनों की बात करें तो 1973 में शिक्षकों का बड़ा आंदोलन हुआ था। बंसीलाल, भजनलाल, भूपेंद्र सिंह हुड्डा सहित अन्य मुख्यमंत्रियों के शासन काल में कर्मचारी आंदोलन कर चुके हैं। प्रदेश में 1973, 1986, 1993, 1996, 2006 सहित कई बड़े आंदोलन हुए हैं। कर्मचारी सरकारों से टकराते रहे हैं।

हरियाणा की राजनीति में एक नेता का बयान कि मास्टरां की मरोड़ और सड़कों के मोड़ नहीं छोड़ूंगा, काफी चर्चित रहा था। इसके बाद जब कर्मचारियों का मौका आया तो इन्होंने भी नेताओं की मरोड़ निकालने में कसर नहीं छोड़ी है।
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