हाथ में हुनर और दिल में ढेर सारे अरमान..., लेकिन इस कला से इतनी भी कमाई नहीं होती कि परिवार का लालन-पालन हो सके।
आपदा आई तो एक झटके में जिंदगी की कमाई यानी सिर छिपाने की जगह (बिल्डिंग) भी मिट्टी में मिल गई। अब दिवाली आ गई।
दीये बनाकर दूसरों के घर को तो रोशन करने की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन उनके अपने घर में दिवाली पर भी ‘अंधेरा’ ही रहेगा। ऐसे हालात हैं चंडीकोटला में रहने वाले लोगों के।
चंडीकोटला में मकानों में दरारें आने के बाद ढहने का सिलसिला अब भी जारी है। यहां एक परिवार में दादी-बहू-पोती मिलकर दूसरों के घरों को रोशन करने की तैयारी कर रही हैं, लेकिन इनके बदले उन्हें पैसे नहीं, बल्कि कुछ किलो अनाज मिलेगा।
घर के एकमात्र पुरुष सराजो की दिहाड़ी से जितने पैसे मिलते हैं, उससे किसी तरह घर चलता है और बाकी थोड़ा-बहुत सहयोग इन महिलाओं की मेहनत से होता है।
दादी जमीला ने बताया कि मकान में दरारें आने और इसके कुछ हिस्से ढहने की वजह से वहां रहना भी मुश्किल है। काफी मेहनत से कुछ पैसे जुटाए थे और मकान बनवाया था। अब वो भी नहीं रहा।
रुख्शाना और उसकी मां हलीमा ने कहा कि पूरा परिवार सराजो की कमाई पर निर्भर है। वे दीये बनाती हैं, लेकिन बाहर जाकर नहीं बेच सकतीं।
इसलिए आसपास ही दीये बेचती हैं। मजबूरी है, क्या करेंगे। वहीं, पड़ोस में रहने वाले लोग चंडीकोटला की बिगड़ती स्थिति के लिए वहां की मिट्टी से गुजरने वाले नाले के पानी को जिम्मेदार मानते हैं।