चंडीगढ़। सनातन, संस्कार और समकालीनता का संगम देवी चित्रलेखा देश-विदेश के लाखों युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं। महज सात वर्ष की उम्र में व्यासपीठ संभालकर श्रीमद्भागवत कथा करने वाली देवी चित्रलेखा ने चंडीगढ़ में आयोजित अमर उजाला जीवांजलि कार्यक्रम में युवाओं को अध्यात्म से जुड़ने और संतुलित जीवन जीने का संदेश दिया। प्रस्तुत हैं उनसे बातचीत के प्रमुख अंश।
प्रश्न: सात वर्ष की उम्र में व्यासपीठ संभालने की यात्रा कैसे शुरू हुई?
उत्तर: इसे मैं बांके बिहारी जी की असीम कृपा और ब्रज के संतों का आशीर्वाद मानती हूं। माता-पिता और गुरुदेव के संस्कारों ने मुझे अध्यात्म की ओर मोड़ा। पहली बार कथा कहते समय मेरे मन में केवल अपने ठाकुर जी की महिमा का गुणगान करने का भाव था, जो आज भी जारी है।
प्रश्न: क्या अध्यात्म का मतलब जिम्मेदारियां और संसार छोड़ना है?
उत्तर: यह बहुत बड़ा भ्रम है। राजा जनक राजा रहते हुए भी आध्यात्मिक थे। अध्यात्म का अर्थ घर छोड़ना नहीं, बल्कि भीतर के विकारों को त्यागना है। आधुनिक कपड़े पहनें, अच्छी शिक्षा लें और तकनीक अपनाएं, लेकिन अपनी जड़ों, संस्कारों और माता-पिता का सम्मान न भूलें।
प्रश्न: सनातन धर्म की असली परिभाषा क्या है?
उत्तर: सनातन धर्म का मूल मंत्र ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ यानी पूरे विश्व का कल्याण है। अपने धर्म पर गर्व करना अच्छी बात है, लेकिन धर्म के नाम पर कट्टरता नहीं होनी चाहिए।
प्रश्न: तनाव और आत्मघाती विचारों से जूझ रहे युवाओं को क्या संदेश देंगी?
उत्तर: जीवन में उतार-चढ़ाव सामान्य हैं। परिस्थितियों के कारण अपने अनमोल जीवन को दांव पर न लगाएं। परिवार के साथ समय बिताएं, अच्छे संस्कार अपनाएं और प्रतिदिन कुछ पल ईश्वर के ध्यान में लगाएं। आध्यात्मिक मजबूती मुश्किलों का सामना करने में मदद करती है।