भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के जोधपुर केंद्र ने एक पेलियोचैनल नेटवर्क बनाया है। इस नेटवर्क के भी वैदिक सरस्वती का ही होने का दावा किया गया है। भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र ने जेसलमेर में एक कुआं खोदकर इसके पानी को 18800 साल पुराना बताया है। मगर ये सब दावे अपने साथ एक मूल सवाल खड़ा करते हैं कि किसी सूखे जलमार्ग (पैलियोचैनल) को सरस्वती का ही जलमार्ग कैसे साबित किया जा सकता है?
लोककथाओं और मान्यताओं को अगर इसका आधार बनाएं तो मिथक ही मिथक को काटते हैं। सरस्वती और इससे मिलते-जुलते नाम से देश और दुनिया में ही कई नदियां हैं। जो नदी पांच हजार साल पहले लुप्त हो गई, उसके लिए ब्रिटिशकालीन राजस्व रिकार्ड कितना विश्वसनीय आधार है? एक सवाल और खड़ा हो रहा है कि नदी के पेलियोचैनल खोदने पर पैसा बहाने में अब क्या लाभ है? क्या शिवालिक की तराई में इसतरह की नहर खोदकर सिर्फ बरसाती पानी का रास्ता बनाया जा रहा है या इस पानी से बरसात के दिनों में तराई से दूर के इलाकों में बाढ़ का भविष्य लिखा जा रहा है?
सरस्वती ज्ञान की देवी का प्रतीक है। नदी के रूप में भी इसकी महिमा को हम प्रणाम करते हैं। ऋग्वेद इसे श्रेष्ठतम नदी कहता है। पारसी मिथकों में इसे दुनिया की नदी कहा गया है। कहीं ऐसा तो नहीं कि सरस्वती आर्यों की एक मानस नदी है। एक सरोवर है। जिसकी तलाश में वे हमेशा रहे और जहां जलधाराएं दिखीं वहीं बस्तियां बसीं, वहीं सरस्वती हुई। सरस्वती अब आस्था का प्रतीक है।
सरस्वती अब राजनीति का भी प्रतीक है और एक ऐसी नदी जो सिर्फ आदिबद्री की मान्यता में ही नहीं, जहन में भी बूंद-बूंद उतरती है। अपने साथ कई सवाल लिए। इन्हीं सवालों के जरिए सरस्वती नदी के सच को जानने की कोशिश है अमर उजाला की यह रिपोर्ट...
सरस्वती के बारे में संसद में जो बताया गया
पीएमओ
पिछली सरकार में राज्यमंत्री वी नारायणसामी ने 20 मार्च 2013 को लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में बताया था कि भारत सरकार वैदिक सरस्वती के आस्तित्व की तलाश के लिए प्रयासरत है और इसके लिए एक कमेटी गठित कर दी गई है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) उत्तरी-पश्चिमी भारत में सरस्वती नदी के पेलियोचैनल का अध्ययन कर रहा है।
हिमालय से कच्छ के रण के बीच नदी के पेलियोचैनल का नक्शा तैयार कर लिया गया है। सरस्वती नदी भी हिमालय में यमुना और सतलुज के सदाबहार स्रोत से ही निकलती थी। इस नक्शे से जाहिर है कि हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख केंद्र कालीबंगां (राजस्थान), बनवाली और राखीगढ़ी (हरियाणा), ढोलावीरा और लोथल (गुजरात) असल में सरस्वती नदी सभ्यता थे।
पेट्रोलियम, नेचुरल गैस मंत्रालय
पिछली सरकार में राज्यमंत्री पी लक्ष्मी ने 22 मार्च 2013 को एक सवाल के जवाब में स्वीकार किया था कि ओएनजीसी प्रोजेक्ट सरस्वती चलाया जा रहा है। इस अभियान के तहत सरस्वती नदी के पेलियोचैनल से गहराई से पानी निकाला जा रहा है। एक कुंआ ‘सरस्वती-1’ जेसलमेर के दक्षिण-पश्चिम में खोदा गया था और इसके पानी को जांच के लिए भेजा गया। हरियाणा, राजस्थान और गुजरात की सरकार के साथ ऐसी खुदाई के लिए एक एमओयू भी साइन किया गया है।
जलसंसाधन व नदी विकास मंत्रालय
राज्यमंत्री संतोष गंगवार ने 17 जुलाई 2014 को लोकसभा में बताया कि इसरो का जोधपुर केंद्र मिथक की नदी सरस्वती का अध्ययन कर रहा है। हरियाणा की आदिबद्री साइट का इससे निकट संबंध है। अभी तक इस संबंध में और कोई कदम नहीं उठाए गए हैं।
सांस्कृतिक राजधानी के तौर पर विकसित होगा आदिबद्री
हरियाणा के शिक्षा एवं पर्यटन मंत्री राम बिलास शर्मा ने कहा कि सरस्वती नदी के जीर्णोद्धार से उद्गम स्थल आदिबद्री को अंतरराष्ट्रीय स्तर के तीर्थ स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा। सरकार कुरुक्षेत्र और करनाल के बीच अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के निर्माण पर भी विचार कर रही है।
शिक्षा मंत्री और हरियाणा विधानसभा के अध्यक्ष चौ. कंवरपाल ने शनिवार को मुगलवाली गांव में चल रहे सरस्वती नदी के खुदाई कार्य का जायजा लिया। इस दौरान उन्होंने जमीन से निकले जल को चखा और श्रमदान भी किया। पत्रकारों से बातचीत में शिक्षा मंत्री ने कहा कि उन्होंने केंद्रीय पर्यटन राज्यमंत्री डॉ. महेश शर्मा से बात की है और शीघ्र ही वे आदिबद्री सरस्वती उदगम स्थल क्षेत्र का दौरा करेंगे।
उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र को सांस्कृतिक राजधानी के तौर पर विकसित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि नासा ने भी सरस्वती के सत्य को स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि सरस्वती शोध संस्थान के अध्यक्ष दर्शन लाल जैन के अथक प्रयासों के परिणाम स्वरूप आज हमारे सामने हैं। सरस्वती नदी का पानी यहां मुगलवाली और सिरसा में एक ही समान है।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस क्षेत्र से विशेष लगाव रहा है, हम उनसे भी यहां के विकास की अपील करेंगे। हरियाणा विधानसभा के अध्यक्ष कंवर पाल ने कहा कि सरस्वती नदी इस क्षेत्र के विकास और प्रगति को नई दिशा देगी। यहां बडे़ चैक डैम का निर्माण भी किया जाएगा। सरस्वती नदी में जल आने से जहां हमारी खोई हुई विरासत और धरोहर को वापस लाया जाएगा, वहीं इस क्षेत्र को बाढ़ की विभिषिका से भी बचाया जा सकेगा।