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Chandigarh News: नागपुर में स्मार्ट डस्टबिन खुद बताते हैं- अब कूड़ा उठा लो

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चंडीगढ़। पिछले कुछ सालों में स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत विभिन्न शहरों में कई प्रयोग किए गए, जिनका बेहतर परिणाम देखने को मिल रहा है। चंडीगढ़ में चल रहे दो दिवसीय स्मार्ट सिटी सीईओ कॉन्फ्रेंस में विभिन्न शहरों ने अपने-अपने बेहतर कार्यों की प्रस्तुति (प्रेजेंटेशन) दी और बताया कि कैसे तकनीक और डाटा की मदद से वर्षों की समस्याओं पर निजात पाने में सफलता मिली।
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नागपुर स्मार्ट सिटी के सीईओ अजय गुलहाने ने कचरा प्रबंधन पर किए गए प्रयासों पर प्रस्तुति दी। बताया कि शहर भर में 400 स्मार्ट डस्टबिन लगाए गए हैं जो वॉल्यूम सेंसर के साथ आरएफआईडी से लैस हैं। इसे आईसीसीसी से कंट्रोल किया जाता है। स्मार्ट डस्टबिन का फायदा यह होता है कि जब यह भर जाता है तो आईसीसीसी के डैशबोर्ड पर अलर्ट जाता है और आईसीसीसी में बैठे कर्मचारी तुरंत उस डस्टबिन को खाली करने के लिए गाड़ी भेज देते हैं।
बताया कि स्मार्ट डस्टबिन से कई फायदे हुए हैं। उन इलाकों की पहचान हुई हैं जहां ज्यादा डस्टबिन की जरूरत है। ये भी पता चला है कि किस इलाके से कितना कूड़ा निकल रहा है। आंकड़ों के साथ पूरी व्यवस्था की निगरानी की जा रही है। बताया कि अगर कोई स्मार्ट डस्टबिन खाली होता है तो आईसीसीसी के डैशबोर्ड पर वह पीले रंग से दिखता है, जैसे ही 40-50 फीसदी भरता है तो नीला हो जाता है और जैसे ही 80 फीसदी से ज्यादा भर जाता है तो वह लाल रंग से दिखने लगता है। बताया कि इस तकनीक से शहर को साफ रखने में काफी मदद मिल रही है। उन्होंने यह भी बताया कि जो कर्मचारी सफाई के काम में लगे हैं, उनकी निगरानी के लिए उन्हें जीपीएस युक्त एक स्मार्ट घड़ी दी गई है।
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स्काडा की मदद से राजकोट ने पानी के संकट पर पाया काबू
राजकोट स्मार्ट सिटी के सीईओ चेतन नंदानी ने बताया कि राजकोट में पानी की काफी समस्या थी लेकिन तकनीक और डाटा की मदद से पानी की मांग और आपूर्ति पर नियंत्रण पाया गया। बताया कि स्काडा की मदद से वह पानी की आपूर्ति को ट्रैक करते हैं। राजकोट में 50 फीसदी पानी स्थानीय स्रोत और 50 फीसदी पानी बाहर से लाया जाता है। यहां पानी 60 से 600 किमी दूर से लाया जाता है। इतना जटिल कार्य होने की वजह से पानी के वितरण में समस्या आती थी। अब वह स्काडा से हर समय पानी की क्षमता को कैलकुलेट करते हैं कि कितनी दूर से और कितना पानी आ रहा है। पानी का डाटा एकत्रित करने के लिए पूरे शहर की जीआईएस और जीपीएस टैगिंग की गई है। किस पानी की पाइप का साइज कितना है, इसकी जानकारी विभाग के पास है।
राजकोट में 18 वार्ड हैं। पानी के आंकड़े होने से फायदा यह हुआ है कि अब विभाग को पता होता है कि उनके पास कितना पानी आ रहा है और कितना पानी किस वार्ड को दिया जा रहा है। इससे किसी भी वार्ड के साथ भेदभाव नहीं होता और पानी को लेकर पिछले कुछ सालों में तकनीक की वजह से विवाद भी कम हुए हैं। उन्होंने बताया कि आने वाले दिनों में वह पानी के कनेक्शनों की भी जिओ टैगिंग करने जा रहे हैं, क्योंकि बहुत से लोग बिल नहीं देते और विभाग को यह पता नहीं चल रहा रहा है कि मीटर लगा कहां है। इससे विभाग के राजस्व में भी बढ़ोतरी होगी।

रोजाना ढाई लाख लोग बस में कर रहे सफर
सूरत स्मार्ट सिटी के नोडल अधिकारी जिगर पटेल ने बताया कि कैसे उन्होंने सार्वजनिक परिवहन को इंटीग्रेटेड कंट्रोल एंड कमांड सेंटर (आईसीसीसी) से जोड़कर लोगों के सफर को आसान बनाया है। कहा कि आईसीसीसी से 891 बसों के रूट की निगरानी की। कौन सी बस स्टॉपेज पर नहीं रुकी, ड्राइवर का व्यवहार, रूट की परफॉर्मेंस देखी गई। देरी होने में ड्राइवर की कमी, बस खराब होना, ट्रैफिक जाम में फंसना और दुर्घटना जैसी बातें सामने आईं। निगरानी के बाद इनमें सुधार कर सेवा बेहतर की गई। प्रत्येक ट्रिप की निगरानी की जा रही है। गति सीमा से तेज बस चलाने पर चालान किए जाते हैं। लगातार ओवर स्पीड पर ब्लैक लिस्ट किया गया। ड्राइवर का प्रदर्शन देखा गया। खराब प्रदर्शन पर प्रशिक्षण अनिवार्य किया गया। इससे यातायात नियमों का उल्लंघन 40 फीसदी तक कम हुआ है। पीक आवर्स में सभी प्रमुख मार्गों की निगरानी किया गया। जिस सड़क पर ट्रैफिक अधिक बढ़ा तो उसे कम करने के लिए रूट डायवर्ट किया गया। बसों में पैसेंजर लोड फैक्टर को देखते हुए अतिरिक्त बसें लगाने में मदद ली गई। इससे ट्रैफिक और सार्वजनिक परिवहन दोनों में बड़ा सुधार देखा गया है।
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