देश विभाजन के बाद पहली बार पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारा श्री करतारपुर साहिब में सिखों के प्रथम गुरु श्री गुरु नानक देव जी के 481वें ज्योति-ज्योत पर्व पर एक नगर कीर्तन सजाया गया। गुरुद्वारा साहिब परिसर से पंज प्यारों की अगुवाई में शुरू हुआ नगर कीर्तन पवित्र परिक्रमा से होता हुआ अंतरराष्ट्रीय सीमा डेरा बाबा नानक (पाकिस्तान की ओर) पहुंचा।
लगभग साढ़े चार किलोमीटर की इस धार्मिक यात्रा के दौरान नगर कीर्तन में शामिल पाकिस्तान संगत सत नाम वाहेगुरु का जाप कर रही थी। यह पहली बार है जब पाकिस्तान के किसी एतिहासिक गुरुद्वारा साहिब से सजाया नगर कीर्तन अंतरराष्ट्रीय सीमा तक पहुंचा। हालांकि कोरोना के कारण करतारपुर कॉरिडोर बंद होने के कारण भारत की तरफ से इस नगर कीर्तन के दर्शनों के लिए डेरा बाबा नानक सीमा पर कोई भी श्रद्धालु नहीं पहुंचा।
पंज प्यारे एक खुली गाड़ी में परंपरागत वेशभूषा और निशान साहिब के साथ सवार थे। श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी एक बड़ी बस में पालकी साहिब में सुशोभित थे। बस को फूलों से सजाया गया था। इस पालकी साहिब के पीछे लगभग 12 गाड़ियां चल रही थी। इन गाड़ियों में पाकिस्तान गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष सतवंत सिंह सहित कई पदाधिकारी सवार थे। जिन गाड़ियों में संगत बैठी थी, उन बसों को अंतरराष्ट्रीय सीमा तक नहीं आने दिया गया।
पाकिस्तान रेंजर अधिकारियों ने अपनी तरफ पर एक नीले रंग की पट्टी लगा रखी थी, ताकि उससे आगे नगर कीर्तन में शामिल लोग न जा सके। पीएसजीपीसी के प्रधान सतवंत सिंह समेत अन्य सिख संगत के साथ गुरुद्वारा साहिब के मुख्य ग्रंथी गोबिंद सिंह ने अरदास की। भाई सतवत सिंह द्वारा भेजे एक संदेश में कहा गया कि पाकिस्तान की सिख संगत की इच्छा थी कि इस एतिहासिक नगर कीर्तन का हिस्सा भारतीय संगत भी बनती।
पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारा साहिबान का संचालन करने वाली ईटीपीबी के प्रवक्ता आमिर हाशमी ने बताया कि इस नगर कीर्तन में पाकिस्तान के पांच हजार श्रद्धालु शामिल हुए। भारत की तरफ से नगर कीर्तन के दर्शनों के लिए कोई भी श्रद्धालु डेरा बाबा नानक की तरफ मौजूद नहीं था। नगर कीर्तन साढ़े 11 बजे गुरुद्वारा साहिबान लौट आया।