15 दिन में 16 श्राद्ध होंगे और पितरों को खुश किया जाएगा। लेकिन इन दिनों में लोगों को भूलकर भी कुछ गलतियां नहीं करनी चाहिएं, वरना खुशियों को ग्रहण लग सकता है।
आश्विन कृष्ण पक्ष श्राद्धपक्ष और पितृपक्ष कहलाता है। इस दौरान मृत्यु प्राप्त व्यक्तिों की मृत्युतिथियों के अनुसार इस पक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है। श्राद्ध दो प्रकार के होते हैं। पार्वण श्राद्ध और एकोदिष्ट श्राद्ध। आश्विन कृष्ण के पितृपक्ष में किया जानेवाले श्राद्ध को पार्वण श्राद्ध कहा जाता है। पार्वण श्राद्ध अपहारण में मृत्यु तिथि के दिन किया जाता है। यह बात सेक्टर-30 के श्री महाकाली मंदिर स्थित भृगु ज्योतिष केंद्र के प्रमुख पंडित वीरेंद्र नारायण मिश्र ने कही। उन्होंने बताया कि साल में मृत्यु तिथि पर मासपक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध को एकोदिष्ट श्राद्ध कहते हैं। एकोदिष्ट श्राद्ध हमेशा मध्याह्न में किया जाता है।
पूर्वजों को श्रद्धासुमन अर्पित करने का महापर्व है पितृपक्ष का श्राद्ध। जो श्रद्धा से किया जाए उसे श्राद्ध कहा जाता है। आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से अमावस्या तक के समय को श्राद्ध कहते हैं। देवालय पूजक परिषद के कोषाध्यक्ष और सेक्टर-18 के श्री राधा कृष्ण मंदिर के पुजारी डा लाल बहादुर दुबे ने बताया कि धर्म शास्त्र कहते हैं कि पितरों को पिंडदान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, यश को प्राप्त करने वाला होता है। पितरों की कृपा से सब प्रकार की समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। पितृपक्ष में पितरों को आस रहती है कि हमारे पुत्र पौत्र पिंड दान करके हमें संतुष्ट कर देंगे।
इसी आस से पितृलोक से पितर पृथ्वी पर आते हैं। मृत्यु तिथि के दिन किए श्राद्ध को पार्वण श्राद्ध कहा जाता है। 24 सितंबर दिन सोमवार को सुबह सात बजकर 18 मिनट पर चतुर्दशी तिथि की समाप्ति है। सात बजकर 19 मिनट पर पूर्णिमा का प्रारंभ होगा। जो कि 25 सितंबर दिन मंगलवार को सुबह 8 बजकर 22 मिनट पर समाप्त हो जाएगा। श्राद्ध तर्पण पिंडदान का समय दोपहर का होता है। इसलिए पूर्णिमा 24 सितंबर दिन सोमवार को होगी।
ये काम नहीं करने चाहिएं
श्राद्ध
श्राद्ध पक्ष में अगर कोई भोजन पानी मांगने आए तो उसे खाली हाथ नहीं जाने दें। कहते हैं पितर कसी भी रूप में अपने परिजनों के बीच में आते हैं और उनसे अन्न पानी की चाहत रखते हैं। गाय, कुत्ता, बिल्ली, कौआ इन्हें श्राद्ध पक्ष में मारना नहीं चाहिए, बल्कि इन्हें खाना देना चाहिए। मांसहारी भोजन जैसे मांस, मछली, अंडा के सेवन से परहेज करना चाहिए। शराब और नशीली चीजों से बचें। परिवार में आपसी कलह से बचें।
ब्रह्मचर्य का पालन करें, इन दिनों स्त्री पुरुष संबंध से बचना चाहिए। नाखून, बाल एवं दाढ़ी मूंछ नहीं बनाना चाहिए। क्योंकि श्राद्ध पक्ष पितरों को याद करने का समय होता है। यह एक तरह से शोक व्यक्त करने का तरीका है। पितृपक्ष के दौरान जो भी भोजन बनाएं उसमें से एक हिस्स पितरों के नाम से निकालकर गाय या कुत्ते को खिला दें। भौतिक सुख के साधन जैसे स्वर्ण आभूषण, नए वस्त्र, वाहन इन दिनों खरीदना अच्छा नहीं माना गया है। क्योंकि यह शोक काल होता है।
श्राद्ध की तिथियां
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पूर्णिमा का श्राद्ध 24 सितंबर सोमवार,
प्रतिपदा का श्राद्ध 25 सितंबर मंगलवार,
द्वितीया का श्राद्ध 26 सितंबर बुधवार,
तृतीया का श्राद्ध 27 सितंबर वीरवार,
चतुर्थी का श्राद्ध 28 अक्तूबर शुक्रवार,
पंचमी का श्राद्ध 29 अक्तूबर शनिवार,
षष्टी का श्राद्ध 30 अक्तूबर रविवार,
सप्तमी का श्राद्ध 01 अक्तूबर सोमवार,
अष्टमी का श्राद्ध 02 अक्तूबर मंगलवार,
नवमी का श्राद्ध 03 अक्तूबर बुधवार,
दसवीं का श्राद्ध 04 अक्तूबर वीरवार,
एकादशी का श्राद्ध 05 अक्तूबर शुक्रवार,
द्वादशी का श्राद्ध 06 अक्तूबर शनिवार,
त्रयोदशी का श्राद्ध 07 अक्तूबर रविवार,
चतुर्दशी और अमावस्या का श्राद्ध 08 अक्तूबर सोमवार
किस श्राद्ध का क्या महत्व
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पूर्णिमा का श्राद्ध
सेक्टर-18 के श्री राधा कृष्ण मंदिर में पुजारी और देवालय पूजक परिषद के कोषाध्यक्ष डा लाल बहादुर दुबे का कहना है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु पूर्णिमा को हो तो उसका श्राद्ध भाद्र शुक्ल पूर्णिमा को करना चाहिए। इसमें दादा-दादी, परदादी और नाना-नानी का श्राद्ध करना चाहिए।
भरणी का श्राद्ध
28 सितंबर को चतुर्थी तिथि दिन शुक्रवार को भरणी नक्षत्र होने के कारण भरणी का श्राद्ध कहा जाता है। भरणी नक्षत्र में पितरों का पार्वण श्राद्ध करने का विशेष महत्व है। यह श्राद्ध करने से गया श्राद्ध करने का महत्व है। नवमी तिथि को सौभाग्यवती स्त्रियों का श्राद्ध किया जाता है।
संन्यासियों का श्राद्ध
संन्यासियों का श्राद्ध पार्वण पद्धति से द्वादशी में किया जाता है। भले ही इनकी मृत्यु तिथि कोई भी क्यों न हो।
मघा का श्राद्ध
सेक्टर-30 के शिव शक्ति मंदिर के पुजारी श्याम सुंदर शास्त्री का कहना है कि 06 अक्तूबर दिन शनिवार को मघा नक्षत्र होने के कारण मघा का श्राद्ध कहते हैं। उनके अनुसार जिनके जन्म कुंडली में पितृदोष के कारण घर परिवार में और पति पत्नी में क्लेश अशांति हो तो वह शांत हो जाता है। घर में सुख शांति रहती है।
अकाल मृत्यु वालों का श्राद्ध
वाहन दुर्घटना, सांप के काटने से, जहर के खाने से, अकाल मृत्यु के कारण जिसकी मृत्यु हुई हो उसका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि में करना चाहिए। चतुर्दशी तिथि में मरने वालों का श्राद्ध चतुर्दशी में नहीं करना चाहिए। इसका श्राद्ध त्रयोदशी या अमावस्या को करना चाहिए, जिसे किसी की मृत्यु की तिथि का ज्ञान न हो उसका श्राद्ध अमावस्या को करना चाहिए।
पंचवली का विशेष महत्व
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वीरेंद्र नारायण मिश्र के अनुसार श्राद्ध में पिंड दान और तर्पण करने के बाद पंचवली करने के बाद ब्राह्मणों को भोजन करवाना चाहिए। पंचवली के बिना श्राद्ध पूर्ण नहीं होता। गो को पश्चिम दिशा में मुख करके पत्ते पर देना चाहिए। कुत्ते को जमीन पर। कौवा को पृथ्वी पर देवता, मनुष्य, यक्ष आदि को पत्ते पर। कीड़े, मकोड़े और चीटियों को पत्ते पर देना चाहिए।