बादल ने कहा कि केंद्र सरकार को एक ऐसा कानून बनाना चाहिए, जो राज्य व केंद्र सरकार चुनाव से पहले जारी किए गए घोषणा पत्र पर अमल नहीं करती वह बर्खास्त होनी चाहिए। मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह पर निशाना साधते हुए बादल ने कहा कि वह बताएं कि तीन वर्ष बीतने के बाद भी उन्होंने जनता से किया एक भी वादा पूरा किया हो। कैप्टन ने प्रदेश की जनता के साथ किए वादों को पूरा न कर विश्वासघात किया है। कैप्टन वादे पूरे करें, अन्यथा मुख्यमंत्री का पद छोड़कर मोती महल में आराम करे।
बादल ने रैली में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर राजीव गांधी की सरकारों द्वारा पंजाब व सिखों के साथ किए अन्याय के बारे में जानकारी देकर पंथक वोट बैंक को एक बार फिर शिअद के पाले में लाने का प्रयास किया। बादल ने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू व इंदिरा गांधी पंजाबियत के विरोध में थे।
उन्होंने कहा कि आज भी पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ व पंजाबी इलाके पंजाब को नहीं मिले। बादल ने पंथक जज्बातों को उभारते हुए कहा कि जो लीडर सीएम व मंत्री की कुर्सी के लिए गांधी परिवार की हाजिरी भरते हैं, उसके माध्यम से गांधी परिवार इस बात को साबित करता है कि श्री हरमंदिर साहिब में फौजी हमला ठीक था।
बादल ने एक बार फिर टकसाली अकाली दल के मुखिया जत्थेदार रंजीत सिंह ब्रह्मपुरा व ढींढसा परिवार को पंथक कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि सुखबीर बादल को अध्यक्ष पद की सेवा देने वाले यही थे। उनको पार्टी का प्रधान बनने के लिए किसने रोका था। सुखबीर के अध्यक्ष कार्यकाल में ब्रह्मपुरा व ढींढसा परिवार ने पार्टी में ऊंचे पदों का सम्मान पाया।
जब अकाली दल की सरकार बनी तो मंत्री बने। उन्होंने सवाल किया कि क्या दिल्ली की हार के बाद मोदी या शाह ने इस्तीफा दिया। बादल ने अपने भाषण में ब्रह्मपुरा व ढींढसा पर आरोप लगाया कि वह कांग्रेस हाईकमान की कठपुतली बनकर शिअद को कमजोर करने की साजिश रच रहे हैं। शिअद की पीठ पर जो भी छुरा घोंपेगा, उससे उन्हें नफरत है।
वह भी सुखबीर के नहीं शिअद के वफादार हैं। यह पंथ विरोधी नेता कांग्रेस के साथ मिलकर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी पर कब्जा करने की साजिश रच रहे हैं। एसजीपीसी सिखों की संसद है, इसे कांग्रेस के हाथों में नहीं जाने दिया जाएगा। इसके लिए हर कुर्बानी देने के लिए शिअद तैयार है।
पार्टी से अलग हुई एक बूंद सागर नहीं बन सकती
बादल ने कहा कि उनकी आयु 93 वर्ष है, राजनीती का अनुभव 70 वर्ष का है। इन वर्षों में उन्होंने राजनीति के कई तमाशे देखे हैं। वह कह सकते हैं पार्टी से अलग हुई एक बूंद सागर नहीं बन सकती। शिअद से अलग हुए नेताओं को ईश्वर अधिक आयु दे, ताकि उन्हें अपनी गलती का एहसास हो और वापस घर लौट आएं। जब ये नेता चुनाव लड़ते थे वह उनकी विधान सभाओं में चुनाव प्रचार के लिए जाते रहें हैं। इनके राजनीतिक अस्तित्व के लिए वह कड़ा परिश्रम करते रहे हैं। अब ये लोग अकाली दल का विरोध कर पार्टी को कमजोर करने की साजिश रच रहे हैं।