दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी (डीएसजीएमसी) के चुनाव में मिली जीत ने शिरोमणि अकाली दल (शिअद) में नई जान फूंक दी है। पार्टी वर्करों में खासा उत्साह है। पंजाब विधानसभा चुनाव में डेरा सच्चा सौदा का समर्थन, सूबे में बेअदबी की घटनाएं और 84 दंगों का मुद्दा शिअद का रास्ता नहीं रोक पाया। शिअद ने इस जीत को पंजाब विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखनी शुरू कर दी है।
पार्टी का मानना है कि डीएसजीएमसी के चुनाव में विरोधियों ने उसके खिलाफ जो मुद्दे उछाले थे, वह सारे मुद्दे पंजाब विधानसभा चुनाव के दौरान भी शिअद-भाजपा गठबंधन के खिलाफ प्रचार में इस्तेमाल किए गए। पार्टी को अब यह लग रहा है कि जिस तरह डीएसजीएमसी चुनाव में पंथक वोट उससे अलग नहीं हुए, ठीक उसी तरह पंजाब विधानसभा चुनाव में भी पंथक वोट शिअद की झोली में ही आए हैं।
डीएसजीएमसी चुनाव में इस बार शिअद को कांग्रेस व आम आदमी पार्टी के चुनाव में उतरने से बंटे वोटों का भी सीधा फायदा हुआ है, ठीक उसी तरह पंजाब में भी इस बार त्रिकोणीय मुकाबला है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के विधानसभा चुनाव में उतरने से शिअद-भाजपा गठबंधन को दिल्ली की तरह ही फायदा हो सकता है।
डीएसजीएमसी चुनाव जीतकर उत्साह से भरी शिअद ने विधानसभा चुनाव परिणाम को लेकर कयास लगाने शुरू कर दिए हैं। हालांकि उसे इसका मलाल भी है कि डीएसजीएमसी चुनाव पंजाब के विधानसभा चुनाव से पहले हो जाते तो अच्छा होता और पंजाब में पार्टी से पंथक वोट दूर जाने का जो प्रचार किया गया, उसका प्रभाव सिख मतदाताओं पर नहीं पड़ता।
शिअद के प्रधान सुखबीर सिंह बादल ने 11 मार्च को घोषित होने वाले विधानसभा चुनाव परिणाम में शिअद की जीत का दावा किया है, जबकि सूबे में पूरी चुनाव प्रक्रिया के दौरान यही माना जा रहा था कि शिअद सत्ता की दौड़ में तीसरे स्थान पर पिछड़ जाएगी। डेरा सच्चा सौदा से समर्थन लिए जाने के बाद चौतरफा आलोचनाओं में घिरी शिअद इस बार विधानसभा चुनाव में काफी दबाव में दिखाई दे रही थी।