20 साल की रिसर्च के बाद शाजी जमां को 8 साल किताब को लिखने में लगे, जो अब दुनिया के सामने है। ‘मुझे यह कहते हुए बड़ा दुख महसूस हो रहा है। लेकिन यह सच्चाई है कि मध्यकालीन भाषाएं जैसे ब्रज, फारसी, अरबी बोलने वाले बहुत कम लोग रह गए हैं। बोलना तो दूर अब तो इन भाषाओं को समझने वाले लोग भी बहुत कम हैं। हो सकता है कि एक दिन ऐसा भी आए जब इन भाषाओं को समझने वाला एक भी इंसान न मिले।’
यह कहना है पत्रकार व लेखक शाजी जमां का, जिनके उपन्यास ‘अकबर’ पर शनिवार को पंजाब यूनिवर्सिटी केइवनिंग ऑडिटोरियम में विचार चर्चा हुई। वह पिछले 20 सालों से मुगल बादशाह अकबर पर शोध कर रहे थे। इस पुस्तक को लिखने में उन्हें 8 साल लगे। 20 साल की शोधयात्रा के बारे में उन्होंने बताया कि इस विषय पर लिखने से पहले उनको कई दस्तावेजों का अध्ययन करना पड़ा।
अकबर के 50 वर्ष के शासन काल दौरान उनकी लड़ाइयों, उनके प्रशासन के बारे में इतिहासकारों ने बहुत कुछ लिखा है। लेकिन अकबर की मनोस्थिति के बारे में पढ़ने को काफी कम मिलता है। उनके दिलोदिमाग में काफी हलचल थी और इसी को जानने के लिए उन सभी दस्तावेजों का अध्ययन किया।
उन्होंने बताया कि लेकिन इस दौरान सबसे बड़ी मुश्किल उनके दस्तावेजों को पढ़ने में हुई। क्योंकि ऐसे बहुत से दस्तावेज और किताबों के अनुवाद उपलब्ध नहीं हैं। जो अनुवाद मिलते हैं उनमें बेशुमार गल्तियां है। शाजी जमां ने कहा कि जिन अंशों को वह समझना चाहते थे उनका उनको दोबारा अनुवाद करवाना पड़ा। उन दस्तावेजों को समझने के लिए उनको फारसी के विद्वानों की सहायता लेनी पड़ी।
इंसान को एक फील्ड में बंधा नहीं रहना चाहिए
पत्रकार से लेखक बनने के सवाल पर उन्होंने कहा कि एक पत्रकार चित्रकार , लेखक और नाटककार भी हो सकता है। और इसी तरह उपन्यासकार भी हो सकता है। इसलिए इंसान को एक ही पेशे में बंधे नहीं रहना चाहिए।
दस्तावेजों में जोधा का जिक्र पत्नी के रूप में नहीं
शाजी जमां ने कहा कि अबुल फजल ने मुगल बादशाह अकबर के दृष्टिकोण से किताबें लिखी हैं। उसे पढ़ने के बाद पाया कि शहंशाह लोगों के सामने अपने अनुरूप छवि बनाना चाहते थे। जोधा के बारे में बात करते हुए उन्होंने बताया कि दस्तावेजों में शहंशाह की पत्नी के रूप में कहीं पर भी जोधा का जिक्र नहीं मिलता।