वो 12 साल की थी, जब भाई भगत सिंह ने शहादत दी थी। शहादत से पहले बहन से कहे थे उन्होंने आखिरी शब्द।
'बहन हमारी कुर्बानी बेकार नहीं जाने वाली और अब इन अंग्रेजों को भारत छोड़ना ही होगा। हमारी इंकलाब की मशाल को तुम बुझने नहीं देना क्योंकि मुझे डर है कि अंग्रेजों के जाने के बाद हुकूमत करने वाले लोग भी शायद काले अंग्रेज ही साबित हों तो तुम्हें उनके खिलाफ भी हमारी यह लड़ाई जारी रखनी होगी'
प्रकाश कौर ने जलाए रखी थी इंकलाब की मशाल
भगत सिंह की शहादत के बाद प्रकाश कौर ने इंकलाब की मशाल जलाए रखी। उन्होंने पूरे परिवार के साथ भगत सिंह के सपने को पूरा करने के लिए किए गए काम और झेली गई मुश्किलें सांझा की थीं तो हर किसी का मन भर आया था।
भगत सिंह के प्रति लोगों का प्यार और चोरी से अंग्रेज हुकूमत के उन्हें फांसी देने व शवों को जला कर सतलुज में बहाने के बाद उमड़ा लोगों का हुजूम और चिता की बची खुची राख की एक-एक चुटकी लेने के लिए लोगों के उत्साह की चर्चा पर सभी रो पड़े थे।
प्रकाश कौर ने सचमुच ही भगत सिंह की मसाल को जलाए रखा और बंटवारे के बाद प्रकाश कौर व उनकी बहन अमर कौर ने मिल कर दोनों ओर की बेटियों की लाज बचाने और उन्हें सुरक्षित परिवारों तक पहुंचाने में अहम रोल अदा किया था।
अंतिम सार्वजनिक उपस्थिति 2005 में
माता प्रकाश कौर की शायद वह आखिरी सार्वजनिक उपस्थिति थी जब 2005 में उन्होंने होशियारपुर में एक स्वागत समारोह में भाग लिया था। उस समारोह की यादें आज भी सबके जेहन में ताजा हैं।
उस दौरान प्रकाश कौर ने युवाओं से शहीद भगत सिंह के सपनों को साकार करने के लिए आगे आने का आग्रह किया था। इसके कुछ ही समय बाद वह कनाडा चली गईं और वहीं अपने दो बेटों और एक बेटी के साथ रहीं।
समारोह में उन्होंने भारत को महान शहीदों के सपनों का राष्ट्र बनाने के लिए युवाओं को आह्वान किया था कि वह भ्रष्टाचार, विभाजनकारी राजनीति, सांप्रदायिकता और संकीर्णता के खिलाफ लड़ने के लिए आगे आएं।
86 साल की उम्र में 2005 में वह होशियारपुर में अपनी भतीजी भूपिंदर कौर के घर आई थीं और उनके आने की खबर मिलते ही उनके सम्मान में विभिन्न संगठन उमड़ पड़े थे।
अपने सम्मान समारोह में उन्होंने अपनी धीमी लेकिन स्पष्ट आवाज में पलकों पर टिके आंसुओं के साथ भगत सिंह की शहादत से पहले उनके साथ जेल में हुई अपनी मुलाकात की यादें ताजा की थीं।