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कैग की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, पंजाब में पोस्ट मैट्रिक स्कालरशिप में जमकर हुए घोटाले

Fri, 10 Aug 2018 09:47 AM IST
हर्ष कुमार सलारिया, अमर उजाला, चंडीगढ़
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cag - फोटो : अमर उजाला
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पंजाब के निजी व सरकारी कालेजों में अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों के लिए पोस्ट मैट्रिक स्कालरशिप (पीएमएस) योजना में अनियमितताओं का मुद्दा लोकसभा तक पहुंच गया है। मंगलवार को संसद में रखी गई कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि पंजाब सहित पांच राज्यों में एससी विद्यार्थियों की पीएमएस योजना में बड़ा घोटाला हुआ है।
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पंजाब में 6.29 लाख स्कालरशिप के दावों में 3275 विद्यार्थियों के कागजात का एक से अधिक बार उपयोग करते हुए शैक्षिक संस्थानों ने दोहरी स्कालरशिप राशि हड़पी, वहीं अनेक शैक्षिक संस्थानों ने एससी विद्यार्थियों से रजिस्ट्रेशन फीस, एग्जामिनेशन फीस, स्कूल फंड आदि के नाम पर पैसा तो वसूली ही, इन मदों के लिए सरकार से भी पीएमएस के तहत मोटी रकम हासिल कर ली, जो उन्होंने एससी विद्यार्थियों को नहीं लौटाई। कैग ने अप्रैल, 2012 से मार्च, 2017 तक सूबे के छह जिलों के शैक्षिक संस्थानों के दस्तावेज की जांच करते हुए 15.63 करोड़ रुपये की हेराफेरी का खुलासा अपनी रिपोर्ट में किया है

कैग
 इसके साथ ही कैग ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की है कि छात्रवृत्ति के अनियमित भुगतान के उदाहरणों के प्रकाश में, मंत्रालय को ऐसे अनियमित भुगतान या दुर्भावना के जोखिम को कम करने के लिए सभी समान मामलों की जांच करनी चाहिए। पंजाब में पीएमएस के भुगतान की भी कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है।

हालांकि योजना में यह निर्देश है कि लाभपात्रों को उनके बैंक खातों के जरिए समय पर वजीफे का भुगतान किया जाए लेकिन पंजाब में 2012-16 के दौरान सरकार ने एससी विद्यार्थियों को फंड रिलीज करने में सरकार ने देरी की जबकि 2016-17 के दौरान नवंबर, 2017 तक 3.21 लाख छात्रों को वजीफा जारी नहीं हो सका था। 

इसके अलावा, पीएमएस का लाभ लेने के बाद सफलतापूर्वक अपनी शिक्षा पूरी करने वाले लाभार्थियों की संख्या का भी कोई रिकार्ड राज्य सरकार के पास नहीं है। जिन विद्यार्थियों ने बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी, उनके वजीफे का हिसाब भी नहीं रखा गया।

विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी, असल लाभपात्रों की जांच नहीं
रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब में 2012 से 2017 तक हर साल स्कालरशिप के दावेदार विद्यार्थियों की संख्या तो बढ़ती रही लेकिन राज्य सरकार ने ऐसा कोई मैकनिजम तैयार नहीं किया, जिससे असल लाभपात्रों का पता चल सके। वर्ष 2012-13 में जहां एससी विद्यार्थियों की संख्या 1.47 लाख थी, 2013-14 में 2.18 लाख, 2014-15 में बढ़कर 2.70 लाख हो गई। वर्ष 2015-16 में विद्यार्थियों की संख्या 3.06 लाख पर पहुंच गई जो 2016-17 में 3.21 लाख दर्शायी गई है।

 कैग ने कहा कि ऐसा कोई वार्षिक एक्शन प्लान नहीं था, जिसके तहत यह पता चल सके कि योग्य लाभपात्रों की संख्या कितनी है और योग्य लाभपात्रों को तय अवधि में समुचित सुविधाएं देने संबंधी भी कोई योजना नहीं बनाई गई। राज्य सरकार के पास योग्य लाभपात्रों का कोई डाटाबेस नहीं है। कैग ने हैरान करने वाला यह दावा भी किया कि पंजाब में भले ही साल-दर-साल स्कालरशिप पाने वाले एससी विद्यार्थियों की संख्या बढ़ती रही लेकिन वास्तविक लाभपात्रों की संख्या काफी कम रही है। 

सांकेतिक तस्वीर - फोटो : amar ujala
योजना की निगरानी-मूल्यांकन का मैकनिजम नहीं
इसके अलावा पंजाब में स्कालरशिप की राशि के भुगतान की कोई निश्चित टाइमलाइन भी नहीं है। पीएमएस योजना के दिशानिर्देशों के अनुसार, हर साल मई-जून में स्कालरशिप के लिए आवेदन मांगे जाने हैं, जिनकी जांच के बाद उनका विवरण सरकारी खजाने को भेजा जाना है ताकि समय पर स्कालरशिप की राशि का भुगतान हो सके। पंजाब में 2012 में नवंबर माह में एससी विद्यार्थियों से आवेदन मांगे गए, जबकि 2013 में एक जुलाई से, 2014 में 26 जून से, 2015 में 29 दिसंबर से और 2017 में 4 जनवरी को आवेदन मांगे गए। 

आवेदन मांगने के इस लापरवाह तरीके की भांति ही पंजाब सरकार द्वारा केंद्र से पीएमएस योजना के लिए प्रस्ताव भेजने में भी समयसीमा का कोई ख्याल नहीं रखा गया। कई बार तो वित्त वर्ष समाप्ति के समय राज्य सरकार ने केंद्र को प्रस्ताव भेजा।

केंद्र और राज्य सरकार ने भी बरती ढिलाई
वर्ष 2012-17 के दौरान, पीएमएस के तहत केंद्रीय फंड में मांगे गए कुल 1403.14 करोड़ के बजट के मुकाबले केंद्र सरकार ने 372.08 करोड़ रुपये के बकाया छोड़कर केवल 1031.06 करोड़ रुपये जारी किए। इसी प्रकार, उक्त अवधि के दौरान 306.71 करोड़ के कुल बजटीय प्रावधान के खिलाफ अपनी प्रतिबद्ध देयता के रूप में राज्य सरकार ने केवल 273.48 करोड़ रुपये जारी किए, जिसके चलते 33.23 करोड़ की कमी हुई।

 इस तरह केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा कम पैसा जारी किए जाने के कारण भी लाभपात्रों को स्कालरशिप समय पर नहीं मिल सकी। इसके बाद 2013-14 के दौरान केंद्रीय फंड के तौर पर प्राप्त हुए 280-81 करोड़ रुपये के मुकाबले राज्य सरकार ने केवल 279.77 करोड़ रुपये जारी किए और बकाया 1.04 करोड़ रुपये अपने पास रख लिए।
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पढ़ाई छोड़ गए विद्यार्थियों के लिए भी वसूली फीस

सांकेतिक तस्वीर - फोटो : amar ujala
पंजाब में छह जिलों के 49 शैक्षिक संस्थानों से 57986 में से 3684 पोस्ट मैट्रिक छात्र वर्ष 2012-17 के दौरान सत्र के बीच में ही पढ़ाई छोड़ गए। इसके बावजूद इन शैक्षिक संस्थानों ने उक्त 3684 विद्यार्थियों के एवज में फीस, मेंटनेंस अलाउंस के रूप में 14.31 करोड़ रुपये सरकार से हासिल कर लिए। इनमें से, दिशानिर्देशों के उल्लंघन करके 2012-14 के दौरान 47 लाख रुपये की राशि का भुगतान किया गया था। इस पर विभाग ने कहा (अक्टूबर 2017) कि उन्होंने वर्ष 2014-15 के लिए भुगतान बंद कर दिया था और वर्ष 2012-14 और 2015-16 के लिए भुगतान की गई राशि अगली भुगतान करते समय समायोजित की जाएगी। 

वर्ष 2016-17 के लिए कोई भुगतान नहीं किया गया था। वर्ष 2013-17 के दौरान, आडिट के लिए चुने गए 29 संस्थानों में से 24 संस्थानों ने परीक्षा शुल्क / स्कूल निधि / पंजीकरण शुल्क  जैसी मदों के लिए 39,213 एससी विद्यार्थियों से 10.14 करोड़ रुपये का शुल्क वसूला। हालांकि इस मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जिन संस्थानों ने एससी विद्यार्थियों से फीस वसूली है, वह सरकार से यह पैसा नहीं लेंगे। इसके बावजूद कई निजी संस्थानों ने विद्यार्थियों से पैसा वसूलने के बाद उन्हीं के नाम पर सरकार से भी पैसा वसूला।
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