हरपाल सिंह के अनुसार सतिंदर सिंह ने ऑडिट के दौरान उन्हें इंटरनल ऑडिटर एसएस कोहली की नियुक्ति की फाइल तक उपलब्ध नहीं करवाई थी। एसजीपीसी द्वारा नियुक्त किए जाने वाले ठेकेदारों की टेंडर फाइल, सचखंड श्री हरमंदिर साहिब के अकाउंट की ऑडिट फाइल और सरायें सारागढ़ी साहिब की फाइलें कभी उपलब्ध नहीं करवाई गई।
इस कारण उनकी कंपनी को ऑडिट में मुश्किल आ रही है। ऑडिटर कंपनी ने इन सभी कार्यों की किसी स्वतंत्र कंपनी से फोरेंसिक ऑडिट करवाने की सिफारिश भी लौंगोवाल से की थी।इस ऑडिट कंपनी ने अपने पत्र में एसजीपीसी के रिकॉर्ड का कंप्यूटरीकरण करने, अकाउंट लिखने की नीति निर्धारित करने, दसवंद, कर्जों की नीति, मुकद्दमों और उन पर होने वाले खर्च, प्रोविडेंट फंड, ग्रेच्युटी के लिए कई ठोस नीतियां बनाने का सुझाव दिया था, जिस पर अमल नहीं हुआ।
इस पत्र में सवाल उठाया गया कि क्या सरकारी ऑडिटर, जो गृह व न्याय विभाग द्वारा नियुक्त किए जाते हैं, इस मीत सचिव के अनुसार ऑडिट करेंगे। इस मीत सचिव ने कभी अपना काम नियमों के अनुसार पूरा नहीं किया। पत्र में यह भी आरोप लगाया गया कि सतिंदर सिंह ने कई बार ऑडिटर को धमकाया भी था।
हरपाल सिंह ने लौंगोवाल को लिखे पत्र में कहा था कि सतिंदर सिंह ने वित्तीय वर्ष 2012-13 के दौरान सचखंड श्री हरमंदिर साहिब के खातों का ऑडिट करने व ट्रायल बैलेंस का ऑडिट शुरू करने तक न तो बैंक का मिलान किया गया, न ही खातों को फाइनल किया गया। तीन बैंक खातों का मिलान पत्र की तारीख तक नहीं किया गया।
रिकॉर्ड समय पर न मिलने के कारण 2012-13 की बैलेंस शीट चार से पांच बार बदलनी पड़ी। ऑडिट रिपोर्ट के दो महीने बीत जाने के बाद भी त्रुटियों को दूर करने के लिए प्रयास नहीं किए गए। वित्त सचिव ने सचखंड और एसजीपीसी की लेजरों के बैलेंस कच्ची पेंसिल से लिखे थे। कई बार बुलाने पर भी सतिंदर सिंह ऑडिटर की मीटिंग में शामिल नहीं हुए।
लापता स्वरूप कहां गए... इस पर कार्यकारिणी चुप क्यों : सरबजीत
सरबजीत सिंह ने कहा कि गोबिंद सिंह लौंगोवाल ने इस पत्र के आधार पर कार्रवाई की होती तो यह स्थिति न बनती। लौंगोवाल को भी अपनी ड्यूटी में कोताही बरतने के आरोप में इस्तीफा देना चाहिए। एसजीपीसी की कार्यकारिणी यह बताने में असमर्थ रही कि लापता स्वरूप कहां गए, वह कौन थे जो पावन स्वरूपों को बिना रिकॉर्ड के बाहर भेजते थे।
जांच रिपोर्ट के अनुसार 328 पावन स्वरूप लापता हुए हैं, 186 पावन स्वरूप वेस्ट व अतिरिक्त अंगों से तैयार कर बिना बिल बेचे गए हैं। इस पर एसजीपीसी खामोश क्यों है।
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