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घर वालों को बताया पेपर देने जा रहे, पहुंच गए थे अयोध्या

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चंडीगढ़। 27 साल की लंबी अवधि बीत जाने के बावजूद छह दिसंबर की याद आते ही अपने आपको विवादित ढांचे के सामने खड़ा पाता हूं। विवादित बाबरी मस्जिद को गिरते और राम का चबूतरा बनाने का पूरा दृश्य आंखों के सामने आ जाता है। चंडीगढ़ के पूर्व पार्षद सतिंदर सिंह उन चुनिंदा कारसेवकों में शामिल थे, जो यहां से अयोध्या पहुंचे थे। वे उस वक्त को याद करते हुए बताते हैं कि 27 नवंबर साल 1992 को वे एक जत्थे के साथ रवाना हुए थे। घर वालों को बताया कि उनका पेपर है। उस वक्त वे राजस्थान से कानून की पढ़ाई कर रहे थे। राजस्थान के बजाय वे अयोध्या पहुंच गए। वहां पर काफी भीड़ थी। एक आश्रम में रुके थे। सरयू में नहाते थे और वहीं तैराकी भी सीखी। अधिक लोग होने के कारण खाना-पीना ठीक ढंग से नहीं मिल पाता था। खिचड़ी के सहारे पूरा दिन काटना पड़ता था।
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भूखे प्यासे कार सेवा में जुटे रहते थे। जब छह दिसंबर का दिन आया तो वहां मौजूद कुछ नेताओं ने कारसेवकों को ढांचा गिराने से रोका था, लेकिन लोगों में इतना गुस्सा व सनक सवार थी, वे अपनों की भी नहीं सुन रहे थे। आंखों के सामने ढांचे को गिरा दिया गया। बाद में पता चला कि आर्मी और पीएसी भी आ रही है। हम लोगों को उन्हें रोकने के निर्देश मिले कि ताकि उनके आने से पहले राम चबूतरा बना दिया जाए। भीड़ पर गोली चलाने की बात भी हुई, लेकिन कारसेवकों के हौसले को देखकर वे भी पीछे हट गए। तीन से चार घंटे में चबूतरे को बना दिया। चबूतरे के लिए एक-एक ईंट वहां पर हम सबने मिलकर रखी थी। उसके बाद से अयोध्या खाली होने लगी थी। 9 दिसंबर को घर लौट आए। इस दौरान घर वालों को पता चल गया था कि उनका बेटा अयोध्या गया हुआ है। जब वे घर लौटे तो घर वालों ने कुछ नहीं कहा।
सतिंदर उस वक्त बजरंग दल से जुड़े थे। उस समय वे 21 साल के थे। उन्होंने बताया कि युवा होने के कारण उस वक्त एक धुन सवार थी कि देश के लिए कुछ करना है, इसलिए बिना कुछ सोचे-समझे अयोध्या के लिए निकल पड़े। आज सुप्रीमकोर्ट ने भी मान लिया है कि वह जमीन भगवान श्री राम की है। इस फैसले के बाद से आज मन प्रसन्न है और पुराने दिनों का याद कर अच्छा महसूस कर रहा हूं।
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