नेपाली युवती से गैंगरेप और दरिंदगी से हत्या के बहुचर्चित मामले में रोहतक कोर्ट ने सभी सातों बालिग आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश सीमा सिंहल की अदालत ने दोषियों को चालान में शामिल आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत अलग-अलग सजा सुनाई।
कोर्ट की टिप्पणी-
लोग महिला को कमजोर समझते हैं। मैं इंसान होने के साथ एक महिला भी हूं। महिला होने के नाते उनका दर्द समझती हूं। मुझे न्यायिक अधिकारी होने के नाते जिम्मेदारी मिली है। मैं महिलाओं की रोने और चिल्लाने की आवाज सुन सकती हूं। जिन पर जुर्म ढाए गए। आज हमारी सभ्यता तो आगे बढ़ गई है। लेकिन हम दिमागी रूप से आज भी बहुत पीछे हैं। देश में लैंगिक पूर्वाग्रह है। थोड़ा नहीं बहुत ज्यादा।
कुछ पुरुष समझते हैं दुष्कर्म और जघन्य जुर्म करके महिलाओं को दबाया जा सकता है। अदालत समाज में एक संदेश देना चाहती है कि महिलाएं कमजोर नहीं हैं। आज महिलाएं दबने और झुकने से साफ इनकार करती हैं। वह दामिनी या निर्भया बनने से इनकार करती है। उन्हें अपनी पहचान और निजता पर अभिमान है। वह किसी भी कीमत पर इसे छोड़ने को तैयार नहीं है।
शर्मिंदगी तो उन पुरुषों और उनके साथियों को करनी चाहिए जो ऐसा घिनौना कृत्य करते हैं। जैसा पीड़िता के साथ हुआ। ऐसे कृत्य से महिला के शरीर ही नहीं बल्कि आत्मा पर भी घाव होते हैं। कोर्ट पीड़िता के शरीर के घाव तो नहीं भर सकती, लेकिन फैसले से उसकी आत्मा के घाव मिटाने का प्रयास किया गया है।
साथ ही यह बताने की कोशिश की है कि आज महिलाएं बेबस नहीं हैं। भविष्य में भी ऐसे जुर्म के दोषियों से अदालत सख्ती से निपटेगी। यह घटना समाज के लिए शर्मनाक है। अपने इस फैसले से मैंने समाज में एक संदेश देने का प्रयास किया है। मैंने अपने करियर में पहली बार फांसी की सजा सुनाई है। इतना कहते ही उन्होंने कलम तोड़ दी और वकीलों और पुलिस अधिकारियों से भरे कोर्ट रूम में सन्नाटा छा गया।