1984 के दंगों की मृतकों की सूची में शामिल दंपति अपने जिंदा होने का प्रमाण पत्र लेकर दर-दर की ठोकरें खा रहा है। उनका आरोप है कि परिजनों ने मुआवजा राशि हड़पने के लिए उन्हें मृत बता दिया था। वह दंगे के दौरान जोधपुर में थे और परिजनों ने उन्हें धमकाकर चुप रहने को कहा था।
बकौल दंपति, उन्होंने रेवाड़ी पुलिस और सीबीआई को भी शिकायत की मगर कोई कार्रवाई नहीं हो सकी। परिजनों ने पीड़ित व्यक्ति की एक बहन को भी मृत घोषित किया था।
वर्तमान में रेवाड़ी की नई आबादी वार्ड नंबर-एक में रहने वाले अमर सिंह (73) के मुताबिक, वह परिजनों के साथ 1984 के दंगों से पहले दिल्ली के सुल्तानपुरी के ब्लाक बी रहता था। परिजनों ने राशन कार्ड में उसका नाम दर्ज करा रखा था। अमर सिंह की शादी 1982 में शीला कौर पुत्री घनश्याम सिंह के साथ हुई।
1984 के दंगे के दौरान अमर सिंह पत्नी के साथ बहन कांता की डिलीवरी कराने जोधपुर चला गया। उस दौरान वहां उन्हें करीब डेढ़ माह तक रहना पड़ा। वह दंगे के कारण केश कटवाकर और पत्नी को साड़ी पहनाकर ट्रेन से रेवाड़ी पहुंचे। यहां अमर सिंह के माता-पिता रहते थे।
दंगा शांत होने के बाद जब दिल्ली सुल्तानपुरी गए तो आस पड़ोस के लोग उन्हें जिंदा देखकर हैरत में पड़ गए। वहां लोगों से पता चला कि परिजनों ने अमर सिंह, उसकी पत्नी और छोटी बहन बलजीत कौर (जयपुर) को मृतक घोषित करा दिया था। परिजनों ने उस समय दंपति को वहां से डराकर वापस भेज दिया। खतरे को भांपते हुए अमर सिंह वापस रेवाड़ी माता-पिता के पास आ गया।