पूरन चंद ने दिया सुखना लेक को बचाने का आइडिया
सूखती सुखना के लिए उम्मीद की उम्मीद की किरण बना है कसौली की पहाड़ी नदी से पानी लाने का प्लान। इस प्लान के भगीरथ हैं 71 वर्षीय पूरन चंद। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट को उन्होंने जो प्रस्ताव सौंपा है, उसकी तारीफ हर अधिकारी कर रहा है। पंजाब ड्रेनेज डिपार्टमेंट के एक आला अधिकारी का कहना है कि वे खुद नदी और पहाड़ी का दौरा करके आए हैं, उससे बेहतर कोई दूसरा उपाय नहीं हो सकता।
इंटर स्टेट का मामला जरूर है, लेकिन हरियाणा सरकार यदि इसमें दिलचस्पी लेती है तो बड़ी आसानी से इस काम को अंजाम दिया जा सकता है। चंडीगढ़ प्रशासन भी इस प्लान को व्यवहारिक मानता है और चाहता है कि इसका विस्तृत अध्ययन हो। अमर उजाला ने रविवार को रज्जीपुर और सूरजपुर गांवों में मौके पर जाकर पूरन चंद के साथ इस प्लान की उपयोगिता का जायजा लिया।
जिस काम में माहिर हूं, वो काम मैंने कर दिया
पूरनचंद पूरे आत्मविश्वास से कहते हैं कि जिस काम में माहिर हूं, वो काम मैंने कर दिया। अब अधिकारियों को उस काम को अंजाम तक पहुंचाना है। जहां तक अनुभव की बात है तो यह कोई मुश्किल काम नहीं है। सिर्फ इच्छाशक्ति की जरूरत है। पूरनचंद ने अगस्त में हाईकोर्ट को अपना प्रस्ताव सौंप दिया था।
उसके बाद यूटी प्रशासन से लेकर पंजाब के अधिकारियों और एमिकस क्यूरी तनु बेदी दौरा कर चुके हैं। हाईकोर्ट में भी इस प्रस्ताव पर चरचा हुई है। हाईकोर्ट में दायर एफिडेविट में यूटी प्रशासन ने भी बताया है कि रज्जीपुर के प्रस्ताव पर संभावनाएं है, लेकिन उसके लिए अध्ययन की जरूरत है।
यह है पूरा प्लान
सुखना लेक घूमने गए पर्यटकों से मारपीट
- फोटो : File Photo
हिमाचल व कसौली की पहाड़ियों से एक बरसाती नदी निकलती है, जो सूरजपुर से रज्जीपुर होते हुए हाईवे को पारकर घग्गर में गिरती है। जब भी हिमाचल या कालका के आसपास बारिश होती है तो ये नदी लबालब भर जाती है। बारिश के दिनों में 12-15 फुट पानी बहता है। इस पानी से इलाके में सिर्फ नुकसान होता है।
पूरन सिंह के प्लान के मुताबिक रज्जीपुर के पास नदी को बंद लगाकर पानी को नया चैनल बनाकर बोलिया के चौ तक पहुंचाया जाए। इसके लिए रास्ते में आने वाली एक पहाड़ी में सुरंग बनानी या उसे काटना होगा। बोलिया का चौ सकेतड़ी के पास आकर गिरता है। सकेतड़ी से सुखना चौ के जरिए पानी को सुखना में लाया जा सकता है। बोलिया चौ पर पानी से गाद रोकने के लिए दो चैक डेम बनाने का प्रस्ताव भी उन्होंने दिया है।
ये हैं चुनौतियां
रज्जीपुर से बोलिया के चौ के रास्ते में एक पहाड़ी आती है। इसलिए इस काम को मूर्तरूप देने के लिए टनल बनानी होगी या पहाड़ी को काटना होगा। पहाड़ी के अध्ययन से ही यह बात तय होगी। इसके अलावा पहाड़ी के दोनों ओर का इलाका हरियाणा वन विभाग के अधीन है। यहां पानी का चैनल बनाने के लिए वन विभाग से क्लीयरेंस लेनी होगी। यह मामला हरियाणा सरकार से भी संबंधित है। इसलिए यूटी प्रशासन को हरियाणा सरकार से सहयोग चाहिए होगा।
ऐसे आया आइडिया
पूरनचंद अपने इलाके से अच्छे-खासे परचित हैं। अखबारों में रोजाना सुखना के बारे में खबरे आ रही थी। उन्होंने देखा कि हाईकोर्ट के जज और अधिकारी सुखना के जंगलों में जाकर उपायों को ढूंढ रहे हैं। उन्हें लगा कि वे भी सुखना के लिए कुछ कर सकते हैं। उसके बाद अखबारों में ही पढ़ा कि हाईकोर्ट ने सुखना को बचाने के लिए शहरवासियों से सुझाव मांगे गए हैं।
एचएमटी में इंजीनियरिंग का अनुभव होने के कारण उन्होंने झट से मुआयना कर रज्जीपुर नदी से लेकर सुखना तक की ड्राइंग बना दी। सुखना को बचाने के लिए उनकी बैचेनी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे रज्जीपुर से अकेले ही पंजाब-हाईकोर्ट पहुंच गए और अपने प्रस्ताव को जमा कराया।
सबसे सटीक सुझाव
सुखना लेक पर पहुंचे विदेशी परिंदे
रज्जीपुर कैचमेंट एरिया में पड़ने वाली चो को सुखना से जोड़ने का सुझाव सबसे सटीक माना जा रहा है। प्रशासन के चीफ इंजीनियर मुकेश आनंद ने बताया कि इस सुझाव का विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है। ग्राउंड लेवल पर यह सुझाव कितना सही बैठता है और कौन सी बाधाएं इसके मार्ग में आएंगी। इसकी पूरी रिपोर्ट तैयार की जा रही है। हालांकि जो दूसरे सुझाव हैं उन पर विचार किया जा रहा है।
अभी किसी फाइनल निर्णय पर नहीं पहुंचा जा सका है। विस्तृत अध्ययन के बाद रिपोर्ट पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट को सौंपी जाएगी। फिर जो भी दिशानिर्देश मिलेंगे उन पर काम शुरू कर देंगे। इससे पहले प्रशासन सुखना कैचमेंट एरिया में बड़े बोरवेल लगाकर सुखना तक पानी लाने पर भी विचार कर रहा है। कैचमेंट एरिया में वॉटर लेवल काफी ज्यादा है। जिससे बोरवेल लगाने से कोई नुकसान भी नहीं होगा।
वहीं टर्शरी वॉटर को ट्रीटमेंट के बाद सुखना में डालने के सुझाव पर भी प्रशासन काम कर रहा है। हालांकि हाईकोर्ट में दिए अपने जवाब में प्रशासन ने इस सुझाव को उतना कारगर नहीं माना है। प्रशासन ने अपने जवाब में कहा था कि सेक्टर-28 स्थित पंपिंग स्टेशन में मौजूद पानी इतनी गुणवत्ता युक्त नहीं बनाया जा सकता जिसे सुखना में डाला जा सके।
अब सभी सुझावों के विस्तृत अध्ययन पर पंजाब और हरियाणा के मुख्य सचिव, चंडीगढ़ प्रशासक के सलाहकार एडवाइजर, तीनों के चीफ इंजीनियर तथा चंडीगढ़ के वन संरक्षक 22 दिसंबर को मीटिंग करेंगे। इस मीटिंग के बाद 23 दिसंबर को हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सभी चीजें रखी जाएंगी।
पूरनचंद का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता है
पूरन चंद ने दिया सुखना लेक को बचाने का आइडिया
बचपन में चाचा चौधरी और साबू की कामिक्स जरूर पढ़ी होगी, जिसमें चाचा चौधरी का एक डायलाग था कि उनका दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता है। कुछ ऐसा ही दिमाग पिंजौर के पूरनचंद का भी है। चंडीगढ़, पंजाब व हरियाणा के बड़े से बड़े इंजीनियर जहां सुखना को बचाने का उपाय नहीं ढूंढ पाए, वहीं पिंजौर के पूरनचंद सुखना के भगीरथ बने। पूरनचंद सुखना को बचाने का सूत्र लाए और आज उनके आइडिया को हर कोई सलाम कर रहा है।
हौसला व जज्बा किसी नौजवान से कम नहीं
71 साल की उम्र में भी पूरनचंद में जो हौसला और जज्बा है, वो किसी नौजवान से कम नहीं। जो भी अधिकारी उनके पास रज्जीपुर नदी या प्रोजेक्ट को देखने आता है, वे उन सभी लोगों को अपने साथ लेकर जाते हैं। उनके गांव से नदी का इलाका काफी ऊबड़-खाबड़ है। करीब एक किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है। यदि दूसरी तरफ यानी पहाड़ की तरफ जाना पड़ जाए तो उसे भी वे लेकर जाते हैं। पहाड़ की ऊंचाई कम से कम 30-40 फुट की होगी। पूरनचंद बताते हैं कि जबसे उन्होंने होश संभाला है, तब से पीछे मुड़कर नहीं देखा।
बेस्ट एथलीट और पहलवान
पूरनचंद की पढ़ाई चंडीगढ़ के डीएवी स्कूल में हुई है। वे अपने स्कूल में लगातार दो बार बेस्ट एथलीट रहे। उन दिनों उन्होंने पहलवानी भी की। उनके मुताबिक वे रोजाना 250 पुशअप और दो हजार से ज्यादा दंड बैठक मारते थे। इसी का नतीजा है कि वे आज भी काफी फिट हैं। उसके बाद उन्होंने रोपड़ से फिटर का डिप्लोमा किया और पिंजौर एचएमटी के टूल डिजाइन प्लानिंग में उनकी नियुक्ति हो गई।
तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा
सुखना लेक से वीड निकालने का काम करते हुए मजदूर
- फोटो : अमर उजाला
सुखना की जो हालत उसके लिए चंडीगढ़ प्रशासन ही जिम्मेदार है। चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से सुखना को बचाने के लिए कोई भी गंभीर उपाय नहीं किए गए। पूरी लेक को किसी एक डिपार्टमेंट को हवाले करने के बजाए तीन-तीन डिपार्टमेंट के बीच बांटा हुआ है।
फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के पास सुखना का कैचमेंट एरिया है, इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के पास सुखना के पानी की जिम्मेदारी है, जबकि बोटिंग की जिम्मेदारी सिटको के पास है। वहीं सुखना से जो भी कमाई आती है वो सिटको अपने पास रखता है।
जानकार मानते हैं कि यदि एक डिपार्टमेंट के पास जिम्मेदारी आ जाए तो सुखना की अच्छी तरह से देखभाल हो सकती है और जो भी समस्याएं आ रही हैं, उनसे निजात भी मिल सके।
लापरवाही का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 4-5 महीनों से वीड निकाली जा रही है, लेकिन अब तक वीड को निकाला नहीं जा सका। जानकारी के अनुसार सुखना की अनदेखी का आलम यह है कि वहां पर वीड निकासी कार्य के निरीक्षण के लिए तीनों ही विभागों से एक भी अधिकारी तैनात नहीं किया गया है।
सुखना लेकर एक नजर में
पूरन चंद ने दिया सुखना लेक को बचाने का आइडिया
सुखना की गहराई- पहले 12.5 फीट, अब 7-8 फीट
सुखना की लंबाई- पहले 2.8 किलोमीटर, अब 2.8 किलोमीटर
सुखना की चौड़ाई- पहले 1 किलोमीटर, अब 700 मीटर
सुखना की स्टोरेज- पहले 10.7 मिलियन हेक्टेयर मीटर, अब करीब 6 मिलियन हेक्टेयर मीटर
सुखना में पानी- सुखना लेक में अभी पानी का स्तर महज दो-तीन फीट ही है।