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बदलने होंगे कानून, तभी बच पाएगा हमारा पर्यावरण, हिसार की प्राचार्य ने सरकार को दिए सुझाव

Mon, 01 Feb 2021 10:13 AM IST
निवेदिता वर्मा सुशील कुमार, अमर उजाला, चंडीगढ़
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डॉ. पूनम चहल। - फोटो : अमर उजाला
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पर्यावरण का नुकसान करने वालों के लिए सजा और जुर्माने का प्रावधान इतना कम है, कि इसका कोई डर ही नहीं है। यह निष्कर्ष वायु अधिनियम, जल अधिनियम और पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम पर साढ़े तीन साल तक अध्ययन करने के बाद हिसार (हरियाणा) स्थित छज्जूराम लॉ कॉलेज की प्राचार्य डॉ. पूनम चहल ने निकाला है। 

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शोध में जो निष्कर्ष आए, उसके आधार पर उन्होंने भारत सरकार को सुझाव दिए हैं कि फैक्ट्रियों से होने वाले प्रदूषण और नदियों का पानी दूषित करने वालों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए और इसके लिए सख्त कानून बनना चाहिए। ऐसा करने से ही जल, जंगल व जमीन को बचाया जा सकेगा। 


उन्होंने अपने शोध के बाद कहा है कि स्थिति भयावह होने से पहले सख्त कानून बनाने होंगे। सजा के प्रावधान को बढ़ाना होगा और जुर्माना भी। कानून कड़े होंगे तभी पर्यावरण शुद्ध रह सकेगा। उन्होंने सरकार से कहा है कि केवल पर्यावरण जागरूकता से काम नहीं चलने वाला। यह कागजों तक ही सीमित है। इसको चुनावी मुद्दा बनाना होगा।

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डॉ. पूनम चहल ने शोध के दौरान पाया कि तीनों अधिनियम में इस बात का कहीं भी उल्लेख नहीं है कि नियम तोड़ने के बाद कार्रवाई के लिए कितने दिन में रिपोर्ट जमा होनी है और कार्रवाई का दायरा क्या होगा। दूसरी बात यह निकलकर आई है कि इन अधिनियमों में नियम तोड़ने वालों पर जुर्माना बहुत कम लगाया गया है। 

वायु अधिनियम में अधिकतम जुर्माना दस हजार रुपये का है और सजा तीन महीने की। भारतीय वन अधिनियम में नियम तोड़ने की सजा छह माह या 500 रुपये के जुर्माने (दोनों भी हो सकते हैं) का प्रावधान है। डॉ. चहल कहती हैं कि यह नाकाफी है। एक बड़ी फैक्टरी का मालिक यदि नियम तोड़ता है तो उसके लिए 500 से दस हजार रुपये भरना कोई कठिन कार्य नहीं है। ऐसे में इस जुर्माने को बढ़ाना होगा।

सरकार को सुझाव 

  • वायु अधिनियम और जल अधिनियम के अंतर्गत रिपोर्ट जमा करने का समय तय हो
  • वायु अधिनियम के सेक्शन 38 में संशोधन होना चाहिए क्योंकि तीन महीने की सजा और दस हजार के जुर्माने का प्रावधान नाकाफी है। अधिनियम 1981 में बना और इस समय वर्ष 2021 चल रहा है।
  • भारतीय वन अधिनियम 1927 में नियम तोड़ने वाले को अधिकतम छह माह की सजा या 500 रुपये जुर्माना या फिर दोनों हो सकते हैं। आज के समय में इसे बढ़ाने की जरूरत है।
  • पर्यावरण जागरूकता के लिए शॉर्ट फिल्में बनानी होंगी, जो लोगों के जेहन में जल्दी प्रवेश करती हैं और असर भी छोड़ती हैं
  • चुनावी मुद्दे में पर्यावरण को शामिल किया जाना चाहिए
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वायु व जल अधिनियम के तहत जुर्माना

  • फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुएं से सबसे अधिक वायु प्रदूषण होता है। इसमें नाइट्रोजन, कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा के मुताबिक जुर्माना लगाया जाता है जो महज दस हजार होता है। फैक्ट्री को बंद भी किया जा सकता है लेकिन ऐसा होता ही नहीं है
  • नदियों, कुओं, नालों या भूमि पर राज्य बोर्डों की ओर से निर्धारित मानक से अधिक प्रदूषित पदार्थों के उत्सर्जन पर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है
  • आतिशबाजी से होने वाले धुएं की कार्रवाई को भी एयर एक्ट के अंतर्गत लाया गया है
  • इन्हीं एक्ट के अंतर्गत केंद्र व राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड काम करते हैं
  • फैक्ट्रियों से निकलने वाले रसायनिक पानी व मल को नदियों में डालने पर भी कार्रवाई का प्रावधान है
  • वायु व जल अधिनियम का संयुक्त रूप ही पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम है। कार्रवाई का प्रावधान भी लगभग वही है। ठोस, द्रव्य व गैस के जरिए यदि प्रदूषण होता है तो वह कार्रवाई के दायरे में आता है

वायु अधिनियम और जल अधिनियम में बदलाव की जरूरत है। ये काफी समय पहले बने थे। जुर्माने से लेकर सजा का कड़ा प्रावधान करना होगा। साथ ही पर्यावरण को चुनावी मुद्दा बनाना होगा। -डॉ. पूनम चहल, प्राचार्य, छज्जूराम लॉ कॉलेज, हिसार

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