डॉ. पूनम चहल ने शोध के दौरान पाया कि तीनों अधिनियम में इस बात का कहीं भी उल्लेख नहीं है कि नियम तोड़ने के बाद कार्रवाई के लिए कितने दिन में रिपोर्ट जमा होनी है और कार्रवाई का दायरा क्या होगा। दूसरी बात यह निकलकर आई है कि इन अधिनियमों में नियम तोड़ने वालों पर जुर्माना बहुत कम लगाया गया है।
वायु अधिनियम में अधिकतम जुर्माना दस हजार रुपये का है और सजा तीन महीने की। भारतीय वन अधिनियम में नियम तोड़ने की सजा छह माह या 500 रुपये के जुर्माने (दोनों भी हो सकते हैं) का प्रावधान है। डॉ. चहल कहती हैं कि यह नाकाफी है। एक बड़ी फैक्टरी का मालिक यदि नियम तोड़ता है तो उसके लिए 500 से दस हजार रुपये भरना कोई कठिन कार्य नहीं है। ऐसे में इस जुर्माने को बढ़ाना होगा।
वायु व जल अधिनियम के तहत जुर्माना
- फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुएं से सबसे अधिक वायु प्रदूषण होता है। इसमें नाइट्रोजन, कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा के मुताबिक जुर्माना लगाया जाता है जो महज दस हजार होता है। फैक्ट्री को बंद भी किया जा सकता है लेकिन ऐसा होता ही नहीं है
- नदियों, कुओं, नालों या भूमि पर राज्य बोर्डों की ओर से निर्धारित मानक से अधिक प्रदूषित पदार्थों के उत्सर्जन पर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है
- आतिशबाजी से होने वाले धुएं की कार्रवाई को भी एयर एक्ट के अंतर्गत लाया गया है
- इन्हीं एक्ट के अंतर्गत केंद्र व राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड काम करते हैं
- फैक्ट्रियों से निकलने वाले रसायनिक पानी व मल को नदियों में डालने पर भी कार्रवाई का प्रावधान है
- वायु व जल अधिनियम का संयुक्त रूप ही पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम है। कार्रवाई का प्रावधान भी लगभग वही है। ठोस, द्रव्य व गैस के जरिए यदि प्रदूषण होता है तो वह कार्रवाई के दायरे में आता है
वायु अधिनियम और जल अधिनियम में बदलाव की जरूरत है। ये काफी समय पहले बने थे। जुर्माने से लेकर सजा का कड़ा प्रावधान करना होगा। साथ ही पर्यावरण को चुनावी मुद्दा बनाना होगा। -डॉ. पूनम चहल, प्राचार्य, छज्जूराम लॉ कॉलेज, हिसार