कोरोना के इलाज में रेमेडिसिविर को काफी अहम माना जाता है लेकिन ऐसा नहीं है। पीजीआई के कोविड-19 के नोडल व डीन एकेडमी प्रोफेसर जीडी पुरी के मुताबिक रेमेडिसिविर और टोसिलिजुमाब कोविड के प्रत्येक मरीज में कारगर नहीं है। कोविड के मरीजों में मृत्यु दर पर काबू पाने में भी इनका कोई अहम रोल नहीं है।
प्रो. पुरी ने बताया कि यह एंटीवायरल ड्रग है, जो कोविड-19 मरीजों को दी जाती है। इसका असर संक्रमण के शुरू के 8 दिनों में देने पर ही होता है। कोविड के कारण हो रही मौत पर काबू में इसका कोई अहम रोल नहीं है, न ही यह शरीर में ऑक्सीजन की जरूरत को पूरा करने में कारगर है। शोध इस बात की पुष्टि करते हैं कि संक्रमण के 10 दिन के बाद दी गई उसकी खुराक से कोई फायदा नहीं मिलता।
प्रो. पुरी ने बताया कि वेंटिलेटर पर आ चुके मरीज को देने से भी इसका कोई फायदा नहीं होता। इसके साथ ही जिन मरीजों में लीवर एंजाइम 5 गुना ज्यादा हो उन्हें भी यह नहीं दिया जाता। इसके देने से किडनी व हृदय पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है। इसलिए इसे विशेषज्ञों की सख्त निगरानी में ही दिया जाना चाहिए।
प्रो. पुरी ने बताया कि मृत्यु दर पर नियंत्रण के लिए डेक्सामीथेजोन एस्ट्रॉयड दिया जा सकता है। इसे भी चिकित्सकीय देखरेख में ही दिया जाना चाहिए, क्योंकि अगर शरीर में ऑक्सीजन का स्तर रूम टेंपरेचर पर ठीक हो तो उसको देने की कोई जरूरत नहीं होती। ठीक वैसे ही टोसिलिजुमाब, रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने वाला इंजेक्शन है और शरीर में साइटोंका इनको नियंत्रित करने में कारगर है। इसे देना भी खतरनाक साबित हो सकता है, क्योंकि इससे सेकेंडरी बैक्टीरियल इंफेक्शन का खतरा रहता है। इसे देने से भी मृत्यु दर पर काबू नहीं पाया जा सकता। इसलिए इसकी तुलना में एस्ट्रॉयड और अच्छी वेंटीलेशन मृत्यु दर पर काबू में इसकी तुलना में ज्यादा कारगर है।