पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने एक नए अध्ययन में छोटे किसानों के लिए पराली प्रबंधन उपायों को अपनाने के लिए विशेष प्रोत्साहन और कम अवधि की फसल किस्मों के तहत क्षेत्र में वृद्धि जैसी कुछ प्रमुख सिफारिशें की हैं। अध्ययन में पाया गया कि किसानों का मानना था कि पराली प्रबंधन को अपनाने से उनका वित्तीय बोझ बढ़ जाता है, और उनमें से कई इस बात से भी अनजान थे कि पराली प्रबंधन से उर्वरकों, कीटनाशकों और खरपतवारनाशकों का उपयोग कम हो जाता है।
लुधियाना स्थित पीएयू के अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र विभाग ने पंजाब में पराली प्रबंधन के लिए कृषि मशीनीकरण को बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय क्षेत्र की योजना का प्रभाव मूल्यांकन अध्ययन किया। पीएयू के प्रधान अर्थशास्त्री संजय कुमार ने कहा कि राज्य सरकार ने पिछले साल मार्च में अध्ययन करने को कहा था। कुमार ने कहा कि राज्य के कृषि विभाग द्वारा करवाए गए इस अध्ययन में राज्य के 22 जिलों के 110 गांवों को शामिल किया गया है। अध्ययन में 2,160 किसानों का चयन किया गया, जिनमें धान की पराली प्रबंधन हस्तक्षेपों को अपनाने वाले 1,320 किसान शामिल थे।
हर साल अक्तूबर और नवंबर में राष्ट्रीय राजधानी में वायु प्रदूषण के स्तर में खतरनाक वृद्धि के पीछे पंजाब और हरियाणा में धान की पराली जलाना एक कारण है। चूंकि धान की फसल के बाद रबी फसल गेहूं के लिए समय बहुत कम होता है, तो किसान फसल अवशेषों को जल्दी से साफ करने के लिए अपने खेतों में आग लगा देते हैं।
पंजाब में सालाना करीब 180 लाख टन पराली पैदा होती है। अध्ययन के मुताबिक, 90 फीसदी किसान इस बात से वाकिफ थे कि धान की पराली जलाने से हवा की गुणवत्ता खराब होती है और धुंध बढ़ती है। ज्यादातर किसान (84-92 प्रतिशत) इस बात से सहमत हैं कि धान की पराली जलाने से सांस की समस्या और आंखों में जलन होती है और इससे बीमार लोगों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और बच्चों को परेशानी होती है।
अधिकांश किसानों ने पाया कि फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों के उपयोग से उनके वित्तीय बोझ में वृद्धि हुई है। लगभग सभी किसानों का मानना है कि धान पराली प्रबंधन को अपनाने से वित्तीय बोझ बढ़ता है क्योंकि मशीनरी का किराया अधिक होता है।