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जानिए, अकाली-भाजपा गठबंधन के बीच दरार की असली वजह, आठ साल से बढ़ रही थीं तल्खियां

Mon, 28 Sep 2020 11:03 AM IST
खुशबू गोयल अशोक नीर, अमृतसर

सार

  • आठ साल की बूंद-बूंद नाराजगी से पड़ी गठबंधन के घड़े में दरार
  • 2012 में सुखबीर बादल को आगे बढ़ाने पर पैदा हुए थे मतभेद
  • बड़े नेताओं का रह गया था गठबंधन, छोटे अलग होना चाहते थे 
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अमित शाह के साथ सुखबीर बादल - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अकाली-भाजपा गठबंधन के बीच पिछले कई साल से तल्खियां बढ़ रही थीं और इन मतभेदों के पीछे की असली वजह भी सामने आ गई है। अकाली-भाजपा गठबंधन 1997 से लेकर 2017 तक हुए पांच विधानसभा चुनाव में तीन चुनाव जीत कर प्रदेश में सत्ता का सुख भोग चुका है।
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2012 में जब अकाली-भाजपा गठबंधन को लगातार दूसरी बार प्रदेश में जनादेश मिला तो तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने सिख राजनीति का हस्तांतरण अपने बेटे सुखबीर बादल को करना शुरू कर दिया। इसके बाद ही अकाली-भाजपा के बीच वैचारिक मतभेद पैदा होने शुरू हो गए थे।

2017 के विधानसभा चुनाव से पहले दोनों पार्टियों के नेताओं के बीच कटुता इतनी बढ़ चुकी थी कि कार्यकर्ताओं ने अपने राजनीतिक आकाओं के आदेश पर एक-दूसरे को पराजित करने में कसर नहीं छोड़ी। 2012 से 2017 के दौरान सुखबीर बादल के साले बिक्रम मजीठिया के अकाली दल में उभरने से भाजपा के तत्कालीन मंत्रियों के साथ न केवल उनके राजनीतिक मतभेद हुए, बल्कि अकाली दल के पदाधिकारियों ने भाजपा के मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए।
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तत्कालीन भाजपा मंत्री अनिल जोशी के विरुद्ध शिअद के तत्कालीन जिला अध्यक्ष उपकार संधू ने खुली लड़ाई छेड़ी हुई थी। इसमें पर्दे के पीछे मजीठिया थे।

भाजपा विधायकों के विरुद्ध अकाली दल का मोर्चा

पंजाब के कई भाजपा विधायकों के विरुद्ध भी अकाली दल ने मोर्चा खोला हुआ था। गठबंधन को 2017 में मिली कड़ी हार का एक कारण यह भी था। पूर्व भाजपा अध्यक्ष दिवंगत कमल शर्मा और सुखबीर बादल ने इन झगड़ों को निपटाने के लिए कभी कोई प्रयास नहीं किया।

चुनाव से एक वर्ष पूर्व दोनों ने निचले स्तर के कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल पैदा करने के लिए समन्वय कमेटियों का गठन किया, लेकिन उनकी कभी बैठक तक नहीं हुई। दोनों दलों के नेताओं के बीच जब वैचारिक मतभेद पैदा हुए तो उसका प्रभाव निचले स्तर के कार्यकर्ताओं पर भी पड़ा। जिला अध्यक्षों व पार्टी पदाधिकारियों के बीच तालमेल बैठाने के लिए कोई भी बैठक नहीं होती थी।

2016 में अकाली दल के नेता भाजपा के तत्कालीन सांसद नवजोत सिद्धू के विरुद्ध मोर्चा खोले हुए थे, लेकिन किसी भाजपा नेता में इतना दम नहीं था कि वह अकाली दल का इस मुद्दे पर विरोध करते। इसी कारण सिद्धू व भाजपा के बीच दूरियां बढ़नी शुरू हो गई थीं। 

भाजपाइयों ने अमित शाह से लगाई थी गठबंधन तोड़ने की गुहार

पिछले कुछ साल में दोनों दलों के बीच कटुता इतनी बढ़ गई थी कि भाजपा ने तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से अकाली दल से अलग होने की वकालत करनी शुरू कर दी थी। 2016 में एक कार्यक्रम के दौरान जब अमित शाह अमृतसर पहुंचे थे तो उन्होंने अकाली-भाजपा की वर्तमान स्थिति पर सभी तत्कालीन मंत्रियों व विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों के साथ बंद कमरे में बातचीत की थी।

तत्कालीन मुख्य संसदीय सचिव डॉ. नवजोत सिद्धू ने सुखबीर बादल और बिक्रम सिंह मजीठिया के बारे में लिखित शिकायत दी थी। इसके बाद शाह ने कहा था कि कार्यकर्ताओं की भावना के अनुसार गठबंधन पर फैसला लिया जाएगा, लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ।

इससे भाजपा कार्यकर्ताओं का न केवल मनोबल टूटा, बल्कि 2017 चुनाव में भाजपा ने उन विस सीटों पर अकाली दल का भीतर ही भीतर विरोध किया, जहां से उनके विधायक चुनाव लड़ रहे थे। बदले में अकाली दल ने भी इसी नीति पर अमल किया।
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भाजपा ने शहरी हलकों के विधानसभा क्षेत्रों में संगठन को नहीं किया मजबूत

23 साल के गठबंधन के कारण भाजपा का प्रदेश संगठन अकाली दल पर इतना निर्भर हो गया था कि जिन शहरी सीटों को अकाली दल के लिए छोड़ा गया वहां भाजपा के नेताओं ने संगठन को मजबूत करने के लिए कोई प्रयास ही नहीं किए। भाजपा का संगठन केवल 23 विधानसभा सीटों में ही मजबूत दिखता है।

मालवा में भाजपा का संगठन अकाली दल की छाया में कहीं खो गया है। अमृतसर दक्षिण विधान सभा हलका, जहां से कभी भाजपा जीत दर्ज करती थी, भाजपा से लेकर अकाली दल ने पहली बार 1997 में अपने उम्मीदवार मंजीत कलकत्ता को चुनाव मैदान में उतारा था। पांच विधानसभा चुनाव में अकाली दल तीन बार यहां से चुनाव जीता और भाजपा के संगठन को लगभग खत्म ही कर दिया। 
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