रामनाथ ने बताया कि घर के छह सदस्यों को बापूधाम से जीएमएसएच लाया गया। वहां से चार मई को पीजीआई में शिफ्ट कर दिया। मेरे अनुरोध पर पीजीआई प्रशासन ने मुझे और मेरी बेटी को एक ही कमरे में भर्ती किया था। उस समय हम सबके लिए एक -दूसरे का सहारा बनना सबसे जरूरी था, क्योंकि कोरोना में शारीरिक परेशानी से ज्यादा मरीज को मानसिक तनाव झेलना पड़ता है। कमरे में प्रतिदिन योगा, मेडिटेशन, एक्सरसाइज करते थे। खाली समय में प्रेरक कथाएं सुनते थे। वीडियो कॉल करके एक दूसरे में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते थे ।
अब जागरूकता फैलाने में जुटा परिवार
संक्रमित सदस्यों का चार से 20 मई तक पीजीआई में उपचार चला। इसके बाद 7 दिनों के लिए सूद धर्मशाला में क्वारंटीन किया गया। अवधि पूरी कर परिवार के सभी सदस्य 27 मई को घर पहुंचे। अपने आंगन में पहुंचकर सभी की आंखें मारे खुशी के छलक उठीं। उस दिन से हमने लोगों को जागरूक करना शुरू कर दिया। फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम के जरिए हम लोगों ने अपने वीडियो और मैसेज लोगों को शेयर किए। रामनाथ का कहना है कि कोरोना से डरने के बजाय हिम्मत से काम लेने की जरूरत है। क्योंकि डर के आगे ही जीत है।