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जाट आंदोलन को रामपाल का समर्थन, मलिक ने कही बड़ी बात

Sat, 18 Feb 2017 03:40 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक(हरियाणा)
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जाट आरक्षण आंदोलन - फोटो : अमर उजाला
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जाट आरक्षण आंदोलन को रामपाल के समर्थन से न केवल सामाजिक, बल्कि राजनीतिक हलकों में भी हलचल मची हुई है। वहीं, यशपाल मलिक ने भी बड़ा बयान दिया। वैसे रामपाल का समर्थन खुद जाट नेताओं के लिए चुनौती से कम नहीं होगा, क्योंकि आर्य समाज व रामपाल समर्थकों के बीच वैचारिक मतभेद रहे हैं। दूसरा जाट समाज के लोग आर्य समाज से भी गहराई से जुड़े रहे हैं।
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हालांकि सरकार से आरक्षण की लड़ाई लड़ रहे जाट नेता फिलहाल तो यही कह रहे हैं कि वे तो हर संत से समर्थन मांग रहे हैं। रामपाल भी उनमें से एक हैं। यशपाल मलिक ने कहा कि वे संत के अनुयायियों को कहना चाहते हैं कि जाट कोई जाति नहीं, बल्कि जब समाज करवट लेता है तो धर्म बदलते हैं। रामपाल हमारे समाज में पैदा हुए। रामपाल ने जाट कौम के पेट से जन्म लिया।

संत के साथ जो घटा, उसका दुख है। शांति से मांगों के लिए संघर्ष करो, एक दिन रामपाल भी आपके बीच में होंगे। उन्होंने कहा कि हम भी समय आने पर आपका साथ देंगे। आर्य समाज को खड़ा करने में जाट समाज का अहम योगदान रहा है। समय आने पर आर्य समाज व रामपाल के शिष्यों के बीच जो वैचारिक मतभेद को दूर करवाया जाएगा।
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रामपाल ने जेल से दिया समर्थन का आदेश

हरियाणा जाट आरक्षण आंदोलन
धरने पर पहुंचे रामपाल के अनुयायी करनाल निवासी रणबीर मान दास ने कहा कि जाट समाज की मांग जायज हैं। क्योंकि सरकार समाज के अंदर फूट डालकर अपने राजनीतिक हित साधना चाहती है।

सरकार ने रामपाल के साथ के साथ गलत किया है। जाट समाज के साथ भी गलत कर रही है। ऐसे में हमने आंदोलन को समर्थन देने का फैसला किया है। समर्थकों ने बताया कि रामपाल के आदेश अनुसार जाट समाज के आंदोलन को समर्थन दे रहे हैं। रामपाल ने जेल से उन्हें यह आदेश दिया है।

रामपाल समर्थक रामकुमार सोलंकी ने कहा कि प्रदेश सरकार की ओर से जाट समाज के साथ ज्यादती की जा रही है। रामपाल पिछले करीब सवा दो साल से जेल में बंद हैं। उन्हें समाज के किसी हिस्से से समर्थन नहीं मिल रहा। ऐसे में एक रणनीति के तहत जाट समाज को समर्थन दिया है।

आर्य समाज व रामपाल समर्थकों के बीच रहा 36 का आंकड़ा
आर्य समाज व रामपाल समर्थकों के बीच गहरा मतभेद रहा है। 2006 में करौंथा आश्रम के खिलाफ शुरू हुए आंदोलन की अगुवाई आर्य समाज ने ही की थी। इतना ही नहीं, दोबारा करौंथा में हुई हिंसा में आर्य समाज के कई युवक शहीद हुए थे।
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