अंबाला डिवीजन में कार्यरत राज सिंह दहिया ने दूसरी बार लिम्का बुक में अपना नाम दर्ज करवाया है। अपने अलग शौक के कारण यह उपलब्धि उन्होंने हासिल की है।
इस कारण दहिया कालका रेलवे में आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। इस उपलब्धि के लिए रेलवे अधिकारी और कर्मचारी उन्हें बधाई दे रहे हैं। दहिया रोहतक (हरियाणा) के निवासी हैं। वर्ष 1991 से भारतीय रेल में गार्ड के पद पर कार्यरत हैं, 1991 में अंबाला में ज्वाइन किया था।
1993 में सहारनपुर (खानआलमपुरा) और 1994 से 2014 तक बठिंडा में और जुलाई 2014 में पदोन्नति लेकर गार्ड मेल एक्सप्रेस कालका में ज्वाइन किया। ड्यूटी के साथ सिक्के, डाक टिकट, नोट और गत्ते वाली रेलवे की टिकटें एकत्र करते हैं। लिम्का बुक में दहिया को मिली इस उपलब्धि का जिक्र इंग्लिश एडिशन 2016 के पेज नंबर 238 पर किया गया है।
इस रिकॉर्ड ने दिलाई पहचान:
रेलवे गत्ते की टिकटें- 00786 से 99786 (100 टिकटें, 2 सेट)
रेलवे गत्ते की टिकटें 00000 (45 टिकटें)
रेलवे गत्ते की टिकटें -11111-99999 (18 टिकटें)
रेलवे गत्ते की टिकटें -10000 से 90000 (18 टिकटें)
रेलवे गत्ते की टिकटें -100-1 (उल्टी गिनती की 39 टिकटें)
रेलवे कम्प्यूटराइज टिकटें -786 आखिरी नंबर (125 टिकटें)
अन्य दस्तावेज जिनका आखिरी नंबर 786
नोट, चेक, ड्राफ्ट, एफडी, एनएसई, पोस्टल आर्डर व महात्मा बुद्ध के जन्म स्थान लुम्बिनी (नेपाल) का प्रवेश टिकट इत्यादि।
कहां से शुरू हुआ शौक
राज सिहं बचपन में अपनी मां रामसती दहिया के साथ जब भी राशन की दुकान पर जाते तो दुकानदार से 10 व 20 पैसे के सिक्के लेकर इकट्ठा करते थे। पिता (रामफल दहिया मरचेंट नेवी में थे) के द्वारा भेजे जाने वाले पत्र से डाक-टिकट उतार पर एकत्र करते थे। पिता के घर आने पर वह उनसे अलग-अलग देशों के सिक्के व नोट लेकर जमा कर लिया करते थे।