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कश्मीर के मुद्दे पर संपादकीय लिखने पर मेडिकल जर्नल 'लैंसेट' पर उठे सवाल, डॉक्टर बोले...

Mon, 19 Aug 2019 12:59 PM IST
खुशबू गोयल आशीष वर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
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फाइल फोटो
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मेडिकल साइंस के सबसे प्रतिष्ठित जर्नल लैंसेट में जम्मू-कश्मीर और धारा 370 के मुद्दे पर प्रकाशित संपादकीय पर सवाल खड़े हो गए हैं। लैंसेट में आम तौर पर संपादकीय हेल्थ से जुड़े इश्यू और पालिसी पर आधारित रहते हैं। इस बार कश्मीर से हटाए गए अनुच्छेद 370 पर एक संपादकीय लिखा गया है, जिससे भारतीय समुदाय के डॉक्टर हैरान हैं। उनका सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर हेल्थ जर्नल को कश्मीर से जुड़े मुद्दे पर लिखने की क्या जरूरत पड़ गई। यदि मुद्दा उठाना है तो दूसरे प्लेटफार्म हैं, उस पर उठाए जा सकते हैं।
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यदि लिखना है तो कश्मीर के अलावा ब्लूचिस्तान, तिब्बत, हांगकांग जैसे मुद्दे पर भी संपादकीय होने चाहिए। जर्नल में प्रकाशित लेख में कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाए जाने को काफी विवादास्पद बताया गया है। साथ ही कश्मीर के लोगों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और स्वतंत्रता की चिंताओं को प्रमुखता से उठाया है। संपादकीय के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि स्वायत्तता को रद्द करने का उनका फैसला कश्मीर में समृद्धि लाएगा। लेकिन पहले कश्मीर के लोगों के दशकों पुराने संघर्ष के गहरे घावों को भरने की जरूरत है, न कि कश्मीर को हिंसा और अलगाव की ओर ले जाना।

कश्मीर का भविष्य भय और अनिश्चिता शीर्षक से प्रकाशित लेख में उल्लेख किया गया है कि भारत के इस कदम से कश्मीर के लोगों में चिंता, अवसाद और तनाव बढ़ेगा। कश्मीरी अपने आपको असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
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पीजीआई के गेस्ट्रोएंट्रोलाजी डिपार्टमेंट में असिस्टेंट प्रोफेसर डा. विशाल का कहना है कि लैंसेट एक प्रतिष्ठित जर्नल है। इसमें किसी डॉक्टर की प्रकाशित स्टडी उसके लिए एक सम्मान होता है। डॉक्टर इस जर्नल को बहुत ही सम्मानित नजरों से देखते हैं। ऐसे में उस मुद्दे को उठाया जाए, जो हर भारतीय के दिल से जुड़ा है तो ठेस तो पहुंचेगी।

लैंसेट को सिर्फ हेल्थ से जुड़े इश्यू पर लिखना चाहिए। यदि वह अपने मुद्दे से हटेगा तो वह नजरों से गिरेगा भी। लैंसेट की आलोचना सोशल मीडिया पर भी खूब हो रही है। डॉक्टरों के एक वर्ग ने तो लैंसेट का बायकाट शुरू कर दिया है। पीजीआई फैकल्टी एसोसिएशन के प्रेसिडेंट प्रोफेसर जेएस ठाकुर ने कहा कि लैंसेट एक हेल्थ जर्नल है न कि पॉलिटिक्स मैग्जीन।

लैंसेट को ऐसा नहीं करना चाहिए। ये भारत का अंदरूनी मामला है। इससे जर्नल की छवि पर असर पड़ सकता है। हालांकि जर्नल में जो संपादकीय प्रकाशित हुआ है, उसमें लिखने वाले का नाम नहीं लिखा है। पीजीआई के एसोसिएशन आफ रेजिडेंट डॉक्टर के प्रेसिडेंट डा. उत्तम ठाकुर कहते हैं कि यदि जर्नल ने कश्मीर के मेंटल हेल्थ पर अपनी टिप्पणी की है तो उसे दूसरे देशों के इश्यू पर लिखना होगा।

इस तरह के इश्यू उठाने के लिए दूसरे प्लेटफार्म हैं। किसी मुद्दे पर अपनी राय रखना अच्छी बात है लेकिन प्लेटफार्म सही होना चाहिए। जो लैंसेट ने गलत किया।

 
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क्या है लैंसेट

लैंसेट मेडिकल शोध के क्षेत्र का एक प्रतिष्ठित जर्नल है। यह दुनिया की सबसे पुरानी, सबसे प्रसिद्ध मेडिकल पत्रिकाओं में से एक है। इसकी स्थापना 1823 में सर्जन थॉमस वेक्ले ने की थी। इसमें मेडिकल शोध, हेल्थ से जुड़े इश्यू की समीक्षा, संपादकीय, हेल्थ से जुड़ी पुस्तकों की समीक्षा व केस रिपोर्ट प्रकाशित किए जाते हैं।

ऐसा माना जाता है कि यदि किसी डॉक्टर का शोध लैंसेट में प्रकाशित हो जाए तो उसके लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि होती है। कई बड़े नामी डॉक्टर रिटायर तक हो जाते है, लेकिन उनके शोध लैंसेट में प्रकाशित नहीं होते। लैंसेट के लंदन, न्यूयार्क और बीजिंग में संपादकीय कार्यालय हैं। इसका इंपैक्ट फैक्टर 53.254 है।

 
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