हरियाणा में सभी सरकारों के लिए पानी की किल्लत हमेशा एक गंभीर मुद्दा रहा है, लेकिन सरकारें इसके प्रति कभी गंभीर नहीं रहीं। प्रदेश में जिस क्षेत्र से भी पानी की मांग जोर पकड़ती है, सरकारी विभाग उस इलाके के लिए वार्षिक योजना तैयार करके जलापूर्ति तो करते हैं लेकिन पूरे प्रदेश के लिए कोई व्यापक पंच वर्षीय योजना कभी बनाई ही नहीं गई। यह खुलासा कैग की वर्ष 2014-15 की रिपोर्ट में हुआ है।
विधानसभा के बजट सत्र के दौरान सदन के पटल पर रखी गई इस रिपोर्ट में राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के अनुच्छेद-14 का हवाला देते हुए कहा गया है कि गांवों में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए विभाग ने विस्तृत पंचवर्षीय योजना तैयार नहीं की।
केवल ग्राम वासियों और पंचायतों की मांगों के आधार पर वार्षिक योजनाएं बनाई गईं। प्रदेश के 15 मंडलों के 1827 गांवों में से 1084 (59 फीसदी) गांव पानी की कमी वाले पाए गए। प्रदेश के शहरों की हालत भी जलापूर्ति के मामले में बहुत अच्छी नहीं रही। रिपोर्ट के अनुसार, 31 मार्च 2010 तक राज्य में 149 गांव जल की कमी वाले थे, जो वर्ष 2015 तक आठ गुना बढ़े हैं।
मार्च, 2015 तक प्रदेश के 154 शहरों में से केवल 78 शहरों में ही पाइप से जलापूर्ति की व्यवस्था हो सकी है। 73 शहरों के लिए अभी तक कोई परियोजना ही तैयार नहीं की गई है। पंचकूला की जलापूर्ति हुडा की ओर से और फरीदाबाद तथा गुड़गांव में नगर निगमों की ओर से यह काम किया जा रहा है। मार्च, 2011 में प्रदेश की 7385 बस्तियों में से 1997 बस्तियां पानी की कमी से जूझ रही थीं। इन सभी बस्तियों में पर्याप्त जलापूर्ति के लिए 2015 तक का लक्ष्य तय किया गया। इसके बावजूद मार्च, 2015 में 455 बस्तियां जल की कमी के जूझ रही थीं।
योजनाओं पर नहीं खर्च हुआ पूरा पैसा :
कैग ने अपनी रिपोर्ट में प्रदेश में वर्ष 2010 से 2015 तक ग्रामीण व शहरी जलापूर्ति योजनाओं के प्रति विभाग की लापरवाही उजागर करते हुए कहा है कि जलापूर्ति योजनाओं का क्रियान्वयन इतना धीमा रहा कि तय बजट भी पूरा खर्च नहीं हो सका। साल 2010-11 में जहां ग्रामीण क्षेत्र के लिए 227 करोड़ व शहरी क्षेत्र के लिए 425.50 करोड़ का बजट तय था, उसमें से ग्रामीण क्षेत्र में 28 फीसदी राशि खर्च नहीं हुई, जबकि शहरी स्कीमों में छह फीसदी राशि बची रह गई।
साल 2014-15 में गांवों के लिए तय 387.89 करोड़ के बजट में से 339 करोड़ रुपये ही खर्च हुए, जबकि शहरी स्कीमों के लिए तय 591.84 करोड़ में से 467.87 करोड़ ही खर्च हुए। इस तरह साल 2010 से 2015 तक पांच सालों में गांवों में जलापूर्ति के लिए जारी 1552.57 करोड़ में 1210.81 करोड़ ही खर्चे गए, जबकि शहरों के लिए जारी 1929.01 करोड़ में से 1604.54 करोड़ ही खर्च हुए।
अधूरी रहीं योजनाएं :
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2010-11 में जलापूर्ति की 1462 योजनाओं पर काम जारी था। इन्हें मिलाकर वर्ष 2010-15 के दौरान कुल 5003 योजनाओं के क्रियान्वयन का निर्णय लिया गया था। हालांकि मार्च 2015 तक 3145 योजनाएं ही पूरी हो सकीं और 1858 योजनाएं वैसे ही छोड़ दी गईं। इनमें से शहरी क्षेत्र की 354 स्कीमों में से पांच साल के दौरान 213 स्कीमें ही पूरी हो सकीं, जबकि 141 स्कीमें अधूरी रह गईं। ग्रामीण इलाकों में 63 फीसदी स्कीमें ही पूरी हुईं, जबकि 37 फीसदी स्कीमें अधूरी छोड़ दी गईं।
पानी की कमी का यह है पैमाना :
केंद्र सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में जलापूर्ति के मानदंड प्रति व्यक्ति प्रतिदिन पानी की उपलब्धता के हिसाब से तय किए हैं, लेकिन इसका पैमाना भी क्षेत्र के अनुसार तय किया गया है। मरुस्थल रहित जिलों में राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल स्कीम के अंतर्गत 55 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन पानी आवश्यक है। जबकि नाबार्ड, एनसीआर और मरुस्थल विकास कार्यक्रम के अंतर्गत लागू स्कीमों में 70 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन जलापूर्ति तय की गई है।
इसके साथ ही शहरी क्षेत्रों में 20 हजार से कम आबादी वाले नगरो में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 110 लीटर पानी और 20 हजार से अधिक आबादी वाले शहरों में 135 लीटर पानी निर्धारित किया गया है। कैग ने इस पैमाने को आधार बनाकर प्रदेश के गांवों और शहरों में पानी की कमी का आकलन किया है।