चंडीगढ़। पंजाब के राज्यपाल एवं चंडीगढ़ के पूर्व प्रशासक बनवारीलाल पुरोहित का करीब तीन साल का कार्यकाल खट्टा-मीठा रहा। एक ओर जहां पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार से उनकी तनातनी रही, वहीं चंडीगढ़ से उन्हें खास लगाव रहा। दो दिन पहले एक प्रेसवार्ता में उन्होंने चंडीगढ़ से अपने लगाव को दिखाते हुए मजाकिया अंदाज में कहा भी कि मैं तो यहां फ्लैट लेकर रहना चाहता हूं और इसके पैसे भी मेरे पास हैं, लेकिन मेरी पत्नी नहीं मानती।
पूर्व प्रशासक पुरोहित ने अपने कार्यकाल में कई अनूठे व कड़े फैसले लिए। नियुक्ति के बाद उन्होंने पंजाब राजभवन में मांसहारी भोजन पर पाबंदी लगा दी। इसके बाद राजभवन में केवल शुद्ध शाकाहारी भोजन ही बनता था। उन्हें फिजुलखर्ची भी बिल्कुल पसंद नहीं थी। अफसरों व स्टाफ के राजभवन पधारने पर चाय-पानी की ही व्यवस्था रहती थी। मेहमाननवाजी पर होने वाले अतिरिक्त खर्चे पर उन्होंने रोक लगा दी थी। चंडीगढ़ में मुफ्त बिजली-पानी व फ्री पार्किंग के फैसले के भी खिलाफ थे, इसलिए उन्होंने नगर निगम सदन में पास इस एजेंडे पर मुहर नहीं लगाई थी। इससे आम आदमी पार्टी व कांग्रेस के नेता उनसे खफा थे। पुरोहित नियमों के भी काफी पाबंद थे। हर मंगलवार और वीरवार को सेक्टर-9 स्थित यूटी सचिवालय पहुंचते थे और फाइलों को निपटाते थे। पुरोहित ने चंडीगढ़ में सरकारी अधिकारियों के साथ होने वाली बैठक के समय में बड़ा बदलाव किया था।
पुरोहित ने बीते 03 फरवरी को व्यक्तिगत कारणों से पंजाब के राज्यपाल और चंडीगढ़ के प्रशासक का पद छोड़ने की इच्छा जताई थी लेकिन तब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया था। इस कारण पुरोहित अपने पद पर बने रहे। बीती शनिवार रात नए प्रशासक की तैनाती हो गई है। गुलाब चंद कटारिया को पंजाब का नया राज्यपाल और चंडीगढ़ का प्रशासक नियुक्त किया गया है।
यूटी सचिवालय में पूर्व प्रशासक बनवारीलाल पुरोहित को लोग कई कार्यों की वजह से याद करेंगे। पुरोहित से पहले तैनात रहे पूर्व प्रशासक वीपी सिंह बदनौर आमतौर पर ज्यादातर बैठकें पंजाब राजभवन में करते थे जबकि बनवारीलाल पुरोहित काफी ज्यादा सक्रिय थे। वे हर मंगलवार और गुरुवार को वह सचिवालय पहुंचते थे। पहले वीपी सिंह बदनौर सचिवालय में सभी बैठकें दोपहर 12 बजे करते थे। दोपहर 12 बजे मीटिंग होने की वजह से अधिकारी पूरे दिन इस बैठक की तैयारी में व्यस्त हो जाते थे और दफ्तर के अन्य काम काफी ज्यादा प्रभावित होते थे।
बनवारीलाल पुरोहित ने बैठक का समय बदला और शाम 4:30 बजे कर दिया ताकि लोगों को परेशानी न हो। अधिकारी पूरे दिन अपने दफ्तर का काम निपटाएं और उसके बाद शाम को बैठक में पहुंचें। बैठकें कभी शाम सात बजे तक तो कभी 7:30 बजे तक चलतीं थीं। बनवारीलाल पुरोहित अगर मंगलवार या वीरवार को सचिवालय न आ सके तो शुक्रवार को सचिवालय पहुंच जाते थे। इसकी वजह से फाइलों के निपटारे में तेजी आई।