दिमागी मलेरिया से अब किसी की जान नहीं जाएगा। क्योंकि बीमारी का इलाज करने के लिए मस्तिष्क तक दवाई पहुंचाने का तरीका खोज निकाला गया है। भारत समेत नाइजीरिया, कांगो, मुजब्बीन और युगांडा में दिमागी मलेरिया हर साल लाखों लोगों को लील रहा है। इससे सर्वाधिक बच्चों की मौत हो रही है।
इसी दिमागी मलेरिया से लोगों को बचाने के लिए पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ के फार्मास्युटिकल विभाग के प्रो. भूपिंदर सिंह भूप ने एक तरीका खोज निकाला है। चार दशक तक चले रिसर्च के बाद अब जाकर कामयाबी मिली है। नेजल टू ब्रेन विधि से दिमागी मलेरिया का इलाज संभव हो सकेगा। इस रिसर्च पर आगे काम करने के लिए डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी ने प्रो. भूप को व इसी विभाग के प्रोफेसर ओपी कटारे को 45 लाख का प्रोजेक्ट दिया है।
खून के जरिये दिमाग तक नहीं पहुंच रही थी दवा
वर्ष 2017 में 87 देशों में 22 करोड़ लोग मलेरिया की चपेट में आए। इसमें 4.50 लाख लोगों की मौत हो गईं। जिन लोगों की मौतें हुईं उनमें 99.7 फीसदी लोग दिमागी मलेरिया से ग्रसित थे। मरने वाले लोगों में नाइजीरिया, कांगो, युगांडा व भारत के वासी थे। वर्ष 2014 में भारत में ही 30 हजार से अधिक लोग इस बीमारी से मर गए थे। मरने वालों में झारखंड, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ व नॉर्थ ईस्ट के लोग शामिल थे। मौतों के इन आंकड़ों से सरकारें भी हिल गई थीं। इलाज के लिए करोड़ों रुपये खर्च भी किए गए, लेकिन सफलता नहीं मिल पाई। सबसे बड़ी अड़चन आ रही थी कि खून के जरिए दिमाग तक दवा नहीं पहुंचाने में।
नैनो फॉर्मूले से मिली कामयाबी
1979 से दिमागी मलेरिया के इलाज के लिए प्रो. भूपिंदर सिंह भूप ने रिसर्च शुरू कर दिया। उन्होंने पता लगाया कि एंटी मलेरिया ड्रग को दिमाग स्वीकार नहीं कर रहा है। दवा मष्तिष्क तक नहीं पहुंच पा रही है। उन्होंने नैनो फॉर्मूले से इस पर काम करना शुरू किया। उन्होंने सबसे पहले ल्यूमिफेंट्रन व आर्टिमिथर एंटी मलेरिया दवाओं की शरीर में उपलब्धता का प्रतिशत जाना। पता लगा कि ल्यूमिफेंट्रन का 12 फीसदी व आर्टिमिथर का 40 फीसदी प्रभाव रहता है। यह दवाएं वाइवेक्स मलेरिया का ही इलाज कर पाईं।
उसके बाद उन्होंने इन दवाओं की शरीर में उपलब्धता का प्रतिशत बढ़ाया। अगले चरण में ड्रग डिलिवरी सिस्टम पर काम किया। उन्होंने पहले वह चीजें खोज निकालीं, जो दिमाग को पसंद होती हैं। उन्होंने ग्लेक्टोस, फिगोस, फास्फोलिपिड्स, शुगर आदि में दवाओं को मिलाकर तरल मिश्रण बनाया और उसके बाद नाक से मष्तिष्क तक दवा पहुंचाई। 99 फीसदी तक एनिमल स्टडी सफल रही। अब फार्मा कंपनियां ह्यूमन स्टडी करेंगी। प्रो. भूप ने बताया कि इस रिसर्च में रिपनदीप कौर, वरुण गोरकी, डॉ. चंद्रभूषण त्रिपाठी, गुनीत, हरमनजोत काम कर रहे हैं।
कैसे होता है दिमागी मलेरिया
मलेरिया मादा एनाफिलीज मच्छर के काटने से फैलता है। इसका प्रभाव बढ़ता जाता है तो यह वाइवेक्स का रूप ले लेता है। लीवर व शरीर के कई अन्य अंगों को नुकसान पहुंचाता है। दवाओं की उपलब्धता शरीर में पूरी न होने के कारण यह दिमाग तक पहुंच जाता है। उसके बाद ठंड लगने के साथ तेज बुखार आता है। पीड़ित व्यक्ति बेहोशी की हालत में आ जाता है। बीपी बढ़ जाता है और व्यक्ति कोमा में चला जाता है। उसके पांच से सात दिन में व्यक्ति की मौत हो जाती है।
दिमागी मलेरिया के इलाज के लिए ट्रिपल स्ट्रैटेजी बनाई गई। दवाओं की शरीर में उपलब्धता का प्रतिशत बढ़ाया गया और उस दवा को नेजल से ब्रेन तक पहुंचाया गया। एनिमल स्टडी पूरी हो गई है। अब मानव स्टडी पर फार्मा इंडस्ट्री काम करेंगी।
- प्रो. भूपिंदर सिंह भूप, यूआईपीएस, पीयू