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पंजाब में पराली जलाना शुरू, सामने आईं तस्वीरें, अक्तूबर के मध्य से बढ़ेगा वायु प्रदूषण

Sat, 26 Sep 2020 04:19 AM IST
ajay kumar आशीष वर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

  • मानसून की विदाई के बाद हवा की दिशा बदलते ही पराली का धुआं चंडीगढ़ आने लगेगा
  • 15 से 20 अक्तूबर के आसपास पराली जलाना चरम पर होगा
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अमृतसर में पराली जलते हुए किसान। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पंजाब में प्रदर्शनों के बीच खेत में पड़े धान के अवशेष को किसानों ने जलाना शुरू कर दिया है। इससे चंडीगढ़ के लोगों की चिंता बढ़ गई है। पीजीआई व पीयू के वैज्ञानिकों ने नासा के सैटेलाइट इमेज से पता लगाया है कि पंजाब के अमृतसर और उसके साथ लगते पाकिस्तान के इलाकों में पराली धड़ल्ले से जलाई जा रही है।

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अभी मानसून मौजूद है और पराली जलाने की प्रक्रिया चरम पर नहीं है, इसलिए असर नहीं है, लेकिन मानसून के विदा होते ही हवाओं की दिशा बदलने के साथ पराली जलाने वालों की संख्या भी बढ़ेगी। इससे 20 अक्तूबर के आसपास चंडीगढ़ व आसपास के इलाकों में वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ने लगा।

ऐसे में लोगों को प्रदूषण से निपटने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। पर्यावरण विशेषज्ञ ने बताया कि अभी कम लोग पराली जला रहे हैं, इसलिए प्रदूषण नहीं है, लेकिन जब पराली जलाने की संख्या बढ़ेगी तो प्रदूषण का बढ़ना तय है। चंडीगढ़ में इस समय वायु गुणवत्ता सूचकांक 88 दर्ज किया गया है, जो नियंत्रण में बताया जा रहा है। मगर पिछले महीने के मुकाबले बढ़ा हुआ है। हालांकि, एक तथ्य यह भी है कि सितंबर में कम बारिश नहीं हुई, इसलिए प्रदूषण के कण हवा में ज्यादा हैं।

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पंजाब में 44 से 51 मिलियन मीट्रिक टन धान का अवशेष जलता है

बीते साल अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (आईएफपीआरआई) ने पांच साल तक फसल अवशेष जलाने (पराली) पर अध्ययन कर एक रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक अकेले पंजाब में अनुमानित 44 से 51 मिलियन मीट्रिक टन धान के अवशेष हर साल जलाए जाते हैं। अध्ययन में इस बात का भी उल्लेख किया गया था कि इससे मिट्टी की उर्वरता के साथ पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचता है।

कहीं किसान अपना गुस्सा पराली जलाने पर न निकाल दें
पंजाब में जिस तरह से किसान कृषि विधेयक के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, उससे चिंता सताने लगी है कि कहीं किसान अपना गुस्सा पराली जलाकर न निकाल दें। यदि ऐसा हुआ तो हालात ज्यादा विकराल हो जाएंगे। पंजाब यूनिवर्सिटी के पर्यावरण विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. सुमन मोर ने कहा कि यदि किसान ऐसा करते हैं तो इससे उनका ही नुकसान होगा। विरोध के दूसरे रास्ते भी हैं।



कोरोना के साथ मिलकर खेल बिगाड़ेगा पराली का धुआं
इस समय कोरोना अपने चरम पर है। यदि इस बीच पराली का धुआं आया तो कोरोना संक्रमण का दायरा बढ़ सकता है। वायु प्रदूषण पर कई सालों से अध्ययन कर रहे पीजीआई के स्कूल आफ पब्लिक हेल्थ के एडिशनल प्रोफेसर रविंद्रा खैवाल ने बताया कि पराली के धुएं से पीएम 10, पीएम 2.5, पीएम 1 के साथ बैंजीन, कार्बन डाई आक्साइड, कार्बन मोनो आक्साइड जैसी कई हानिकारक गैसें निकलती है, जो सांस लेने के दौरान शरीर के अंदर जाती हैं और फेफड़े व हृदय को नुकसान पहुंचाती हैं। इस दौरान यदि व्यक्ति कोरोना संक्रमित हुआ तो उसे डबल नुकसान झेलना पड़ सकता है। लोगों को अगले कुछ महीने ज्यादा एहतियात बरतनी होगी।

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