बीते साल अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (आईएफपीआरआई) ने पांच साल तक फसल अवशेष जलाने (पराली) पर अध्ययन कर एक रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक अकेले पंजाब में अनुमानित 44 से 51 मिलियन मीट्रिक टन धान के अवशेष हर साल जलाए जाते हैं। अध्ययन में इस बात का भी उल्लेख किया गया था कि इससे मिट्टी की उर्वरता के साथ पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचता है।
कहीं किसान अपना गुस्सा पराली जलाने पर न निकाल दें
पंजाब में जिस तरह से किसान कृषि विधेयक के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, उससे चिंता सताने लगी है कि कहीं किसान अपना गुस्सा पराली जलाकर न निकाल दें। यदि ऐसा हुआ तो हालात ज्यादा विकराल हो जाएंगे। पंजाब यूनिवर्सिटी के पर्यावरण विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. सुमन मोर ने कहा कि यदि किसान ऐसा करते हैं तो इससे उनका ही नुकसान होगा। विरोध के दूसरे रास्ते भी हैं।
कोरोना के साथ मिलकर खेल बिगाड़ेगा पराली का धुआं
इस समय कोरोना अपने चरम पर है। यदि इस बीच पराली का धुआं आया तो कोरोना संक्रमण का दायरा बढ़ सकता है। वायु प्रदूषण पर कई सालों से अध्ययन कर रहे पीजीआई के स्कूल आफ पब्लिक हेल्थ के एडिशनल प्रोफेसर रविंद्रा खैवाल ने बताया कि पराली के धुएं से पीएम 10, पीएम 2.5, पीएम 1 के साथ बैंजीन, कार्बन डाई आक्साइड, कार्बन मोनो आक्साइड जैसी कई हानिकारक गैसें निकलती है, जो सांस लेने के दौरान शरीर के अंदर जाती हैं और फेफड़े व हृदय को नुकसान पहुंचाती हैं। इस दौरान यदि व्यक्ति कोरोना संक्रमित हुआ तो उसे डबल नुकसान झेलना पड़ सकता है। लोगों को अगले कुछ महीने ज्यादा एहतियात बरतनी होगी।