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पंजाब के कमाऊ पूत नाराज, कैसे मिलेगी वोट

Wed, 16 Apr 2014 04:01 PM IST
अखिल तलवार/अमर उजाला, चंडीगढ़
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पंजाब के कमाऊ पूत माने जाने वाले उद्यमियों का हाल बेहाल है। नई इंडस्ट्री को आकर्षित करने की तो योजनाएं बनाई जा रही हैं लेकिन पुरानी को ऑक्सीजन नहीं मिल रही है। केंद्र और राज्य सरकार की उदासीनता के कारण उद्यमी खासे नाराज हैं। उम्मीदों से लेकर मायूसी का सफर तय करने के बाद उद्यमी हार गए हैं।
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पंजाब की परंपरागत इंडस्ट्री या तो बंद हो रही है, या फिर दूसरे राज्यों मे शिफ्ट हो रही है। गुरु की नगरी अमृतसर टेक्सटाइल के लिए जानी जाती थी, आज तीस फीसदी से ज्यादा टेक्सटाइल यूनिट बंद हो चुकी हैं। स्पोर्ट्स हब जालंधर का सिक्का विदेशों में चलता था लेकिन अब यहां के उद्यमियों ने मैन्युफैक्चरिंग छोड़ कर ट्रेडिंग शुरू कर दी है।

लुधियाना का साइकिल उद्योग बदहाल है। बटाला की हैंडटूल यूनिट लगातार बंद हो रही हैं। तो मालवा में कॉटन पर आधारित इंडस्ट्री का बुरा हाल है। यहां तक की मोहाली की इंडस्ट्री भी तमाम समस्याएं से जूझ रही हैं।
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जमीन, लेबर, बिजली और पेट्रोल की ज्यादा कीमतें तो पूरे पंजाब में इंडस्ट्री के लिए समस्या हैं। लंबे इंतजार के बाद आई राज्य सरकार की उद्योग नीति नए निवेश के लिए तो बढ़िया है, पर मौजूदा इंडस्ट्री को उसमें अपने लिए कुछ नहीं दिखता।

ऐसी है अमृतसर के उद्योगों की स्थिति

अमृतसर टेक्सटाइल इंडस्ट्री का गढ़ रहा है। यहां शॉल, कंबल, शूटिंग -शर्टिंग, दुपट्टा, ड्रेस मैटीरियल, मिंक ब्लैंकेट, प्रोसेसिंग व प्रिंटिंग की इंडस्ट्री काफी तादाद में थी। इसके अलावा नट-बोल्ट, स्क्रू, पंखा, फार्मा और लाइट इंजीनियरिंग इंडस्ट्री भी है। टेक्सटाइल इंडस्ट्री एसोसिएशन के प्रेसिडेंट प्यारे लाल गर्ग कहते हैं कि रोजगार देने के मामले में खेतीबाड़ी के बाद टेक्सटाइल इंडस्ट्री दूसरे स्थान पर है। वहीं निर्यात भी चालीस फीसदी है। इंडस्ट्री की लंबे समय से मांग रही है कि ब्याज दर खेतीबाड़ी के बराबर की जाए।

अभी यह 14 फीसदी है जो जोड़ने पर 21 फीसदी बन जाती है। पर केंद्र की तरफ से कोई राहत न मिलने के कारण इंडस्ट्री में निराशा है, तीस फीसदी से ज्यादा यूनिट बंद हो चुके हैं। राज्य सरकार ने 2006 के बाद कोई टेक्सटाइल पॉलिसी नहीं बनाई। 2003 में सीमांत राज्यों में टेक्सटाइल इंडस्ट्री पर तीस प्रतिशत कैपिटल सब्सिडी देने का ऐलान किया गया। जो आज तक नहीं मिली।

हाईकोर्ट में केस जीतने के बाद भी सरकार ने वह रकम नहीं दी। अब उद्यमी अवमानना का केस करने जा रहे हैं। अब एक अच्छी खबर नेशनल टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी की तरफ से आ रही है। जिसमें संकेत दिया गया है कि ब्याज दर घटाई जाएगी और इसमें ज्यादा रोजगार को देखते हुए श्रम कानून नरम किए जाएंगे।

ये है जालंधर के उद्योगों के हाल

जालंधर एक जमाने में पंजाब ही नहीं, दुनिया का स्पोर्ट्स हब माना जाता था। बड़े-बड़े दिज्गज जालंधर में बने बैट से ही चौके-छक्के जड़ते थे। पर आज यहां की स्पोर्ट्स इंडस्ट्री तबाह हो गई है। न केंद्र सरकार ने सुध ली, न राज्य सरकार ने सुनी।

जालंधर खेल उद्योग संघ के कनवीनर रविंदर धीर ने कहा कि मेरठ और जेएंडके में स्पोर्ट्स गुड्स को वैट मुक्त करने से वहां इंडस्ट्री प्रफुल्लित हो रही है। कई साल से आंदोलन के बाद भी राज्य सरकार ने 6.05 प्रतिशत वैट को खत्म नहीं किया। जिससे यहां की इंडस्ट्री मुकाबले से बाहर हो गई।

कई पीढ़ियों से इस कारोबार में लगे लोग एकाएक शिफ्ट नहीं कर सकते, तो उन्होंने ट्रेडिंग को अपना लिया। बाहर से सामान लाकर यहां लेबल लगाया जाता है। मैन्युफैक्चरिंग बंद ही हो रही है। चीन से क्रिकेट आइटम छोड़ कर सभी चीजें आ रही हैं। ताईवान से बैडमिंटन रैकेट, शटल कॉक आ रही है। तो जेएंडके और पाकिस्तान से बैट आ रहे हैं।

जेएंडके में पहले एक यूनिट होती थी, आज करीब चार सौ हैं। केंद्र सरकार ने भी जख्मों पर नमक ही छिड़का है। चार साल पहले स्पोर्ट्स गुड्स पर दो फीसदी से ज्यादा एक्साइज ड्यूटी लगा दी। कच्चे माल के आयात पर ड्यूटी ज्यादा और तैयार माल पर कम है। जिसके चलते बाजार पर चीन का कब्जा होता जा रहा है।

ऐसा है लुधियाना का उद्योग जगत

मैनचेस्टर ऑफ इंडिया लुधियाना में साइकिल, होजरी, हैंडटूल, मशीन टूल समेत कई इंडस्ट्री हैं। पर इसे साइकिल और होजरी इंडस्ट्री का गढ़ माना जाता है। केंद्र सरकार ने होजरी इंडस्ट्री पर एक्साइज ड्यूटी लगा दी थी। उद्यमियों के संघर्ष के बाद निवर्तमान सांसद मनीष तिवारी की कोशिशों से वह वापस हो गई। पर साइकिल इंडस्ट्री अब भी एक्साइज ड्यूटी के जंजाल में फंसी हुई है।

सालाना डेढ़ करोड़ साइकिलों के निर्माण के साथ लुधियाना देश की 90 साइकिलों का उत्पादन करता है। पिछली केंद्र सरकार ने आते ही एक फीसदी एक्साइज ड्यूटी लगा दी, फिर बढ़ा कर दो फीसदी कर दी। जिससे लुधियाना वैश्विक बाजार में पिछड़ने लगा है। क्योंकि ड्यूटी के बाद साइकिल 60-70 रुपये मंहगी हो गई है। उद्यमियों को पहले कच्चे माल पर भी बारह प्रतिशत से अधिक ड्यूटी देनी पड़ती है। फिर निर्यात पर दो फीसदी ड्यूटी है। इसका फायदा ड्रैगन उठा रहा है, चीन से आयात बढ़ता जा रहा है।

चीन से करीब दो लाख साइकिल प्रति वर्ष आ रही हैं, जिसका असर घरेलू इंडस्ट्री पर पड़ रहा है। यूनाइटेड साइकिल एंड पार्ट्स मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के महासचिव राजीव जैन कहते हैं कि साइकिल को एक्साइज ड्यूटी से मुक्त किए बगैर बाजार में लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है। आयात रोकने के लिए साइकिल पर पचास फीसदी ड्यूटी की जाए। साथ ही आयात होने वाली मशीनरी पर ड्यूटी घटाई जाए।

मोहाली में ये है उद्यमियों की स्थिति

फ्यूचर सिटी और कैपिटल सिटी मोहाली के उद्यमी भी समस्याओं से घिरे हैं। यहां मुख्य तौर पर ट्रैक्टर पार्ट्स, सेनिटरी फिटिंग, इलेक्ट्रिकल गुड्स, रेलवे कंपोनेंट्स और पैकेजिंग इंडस्ट्री है। मोहाली में 95 फीसदी इकाइयां स्माल स्केल या एमएसएमई हैं। मोहाली इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के पास्ट प्रेसिडेंट अनुराग अग्रवाल कहते हैं कि राज्य सरकार ने नई इंडस्ट्री पॉलिसी में नए उद्योगों को आकर्षित करने के लिए तो इंसेंटिव दिए हैं। पर मौजूदा इंडस्ट्री के लिए कुछ भी नहीं है।

विस्तार पर इंसेंटिव हैं, पर इतना बड़ा एक्सपैंशन छोटे उद्यमी के लिए संभव ही नहीं है। वैट ऑनलाइन करना अच्छा कदम है, पर इसमें जो ऑपरेशनल प्रॉब्लम्स आ रही हैं, उनके हल के लिए भी कोई होना चाहिए। वैट रिफंड न होने से इंडस्ट्री को समस्या आ रही है। इंसेंटिव सिर्फ फोकल प्वाइंट के लिए हैं, जहां जमीन मंहगी है, उसके बाहर भी इंडस्ट्री को इंसेंटिव दिए जाने चाहिए। राज्य सरकार ने बिजली देकर एक अच्छा काम किया है। ट्रक यूनियन की गुंडागर्दी भी उद्यमियों के लिए समस्या है।

उधर, केंद्र सरकार भी छोटी इंडस्ट्री के लिए कुछ नहीं कर रही है। एक्साइज-एज्जेम्प्शन लिमिट आठ साल से तीन करोड़ ही चली आ रही है। अगर मुद्रा स्फीति के हिसाब से ही देखें तो यह आठ करोड़ हो जानी चाहिए थी। पंजाब में बाहर से ही माल आता है, बाहर ही बेचना होता है, इसलिए बार-बार सीएसटी लगता है। केंद्र सरकार आज तक जीएसटी लागू नहीं कर सकी। केंद्र की स्किल डेवलपमेंट की स्कीमों का फायदा भी कॉरपोरेट्स ही ले जाते हैं, छोटी इंडस्ट्री को कुछ नहीं मिलता।
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राज्य सरकार की नई उद्योग नीति

राज्य सरकार ने पिछले साल इंसेंटिव आधारित उद्योग नीति लांच की है। सरकार का दावा है कि इस क्रांतिकारी नीति से निवेश को बढ़ावा मिलेगा। नई इंडस्ट्री लगाने में आने वाली परेशानियां बिल्कुल खत्म हो जाएंगी क्योंकि सारी प्रक्रिया का सरलीकरण कर दिया गया है।

पारदर्शिता के साथ ऑनलाइन मंजूरी दी जाएगी। नई नीति के तहत सरकार ने वैट, सीएसटी, बिजली ड्यूटी, स्टांप ड्यूटी, प्रॉपर्टी टैक्स, पर्चेज टैक्स, मार्केट फीस, रूरल डेवलपमेंट फंड और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट सेस पर इंसेंटिव दिया है। नीति के तहत पंजाब को दो जोन में बांटा गया है। जोन-1 में वे इलाके हैं, जहां इंडस्ट्री कम है और जोन-2 में ज्यादा इंडस्ट्री वाले इलाके हैं।

जोन एक में 1-10 करोड़ तक फिक्सड कैपिटल इन्वेस्टमेंट करने पर सात साल तक वैट पर पचास फीसदी छूट मिलेगी, सीएसटी का 75 प्रतिशत भी  अपने पास रख सकेंगे। 10-25 करोड़ निवेश पर छूट आठ सालों के लिए होगी। पांच सौ करोड़ से ज्यादा निवेश पर वैट में 80 प्रतिशत छूट, 75 फीसदी सीएसटी के साथ-साथ बिजली व स्टांप ड्यूटी और प्रॉपर्टी टैक्स में सौ फीसदी छूट मिलेगी।

वहीं, जोन दो में 10-25 करोड़ के निवेश पर आठ साल तक वैट में 25 फीसदी छूट और पचास फीसदी सीएसटी रखने की सुविधा मिलेगी। सरकार ने एग्रो व फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री के लिए कुछ और रियायतें भी रखी हैं।
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