लोकसभा चुनाव में बुरी तरह मात खाने के बाद विधानसभा चुनावों से पहले सोनिया और राहुल गांधी पर नई टीम बनाने का दबाव बढ़ता जा रहा है। केंद्रीय संगठन यानी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में ही नहीं बल्कि राज्यों की प्रदेश इकाइयों में भी हारे हुए नेताओं को बाहर करने का दबाव कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पर बनाया जा रहा है।
राहुल और सोनिया गांधी इसी के मद्देनजर रविवार छोड़कर हफ्ते के छह दिन लगातार प्रदेश भर के कांग्रेस नेताओं से मुलाकात कर रहे हैं। अभी तक वह कांग्रेस शासित सभी मुख्यमंत्रियों के अलावा सभी प्रदेश अध्यक्षों और पार्टी कार्यसमिति के सदस्यों से मिल कर उनकी राय ले चुके हैं।
संगठन में बदलाव के अलावा जिन राज्यों में इस साल चुनाव है वहां उठ रहे नेतृत्व परिवर्तन की मांग की सुनवाई का काम भी हाईकमान के एजेंडे पर है। इस साल महाराष्ट्र, हरियाणा, जम्मू कश्मीर, झारखंड और दिल्ली में चुनाव होने हैं।
प्रदेश स्तर से होगी फेरबदल की शुरूआत
लोकसभा चुनाव में 44 सीटों पर सिमटी और 13 राज्यों में खाता तक खोल नहीं पाई कांग्रेस के अंदर सोनिया और राहुल बेहद खामोशी से पार्टी में बदलाव की प्रक्रिया को मूर्त रूप देने में जुटे हुए हैं। दोनों नेताओं ने मेल-मुलाकात का सिलसिला तेज कर दिया है।
संगठन में फेरबदल की शुरूआत प्रदेश स्तर से हो सकती है। पंजाब के प्रताप सिंह बाजवा, उत्तर प्रदेश के निर्मल खत्री, मध्य प्रदेश के अरुण यादव, उत्तराखंड के यशपाल आर्य और महाराष्ट्र के माणिक राव ठाकरे समेत कई प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षों की कुर्सी जा सकती है।
हारे हुए नेताओं को जिम्मेदारी देने का हो रहा विरोध
एआईसीसी में सबसे ज्यादा दबाव उन नेताओं को हटाने का है, जो कि हार के बावजूद राज्यों के प्रभारी बने हुए हैं। अंबिका सोनी, सी पी जोशी, मुकुल वासनिक, गुरूदास कामत, अजय माकन, मधुसूदन मिस्त्री, अशोक तंवर, हरीश चौधरी समेत कई पदाधिकारियों की छुट्टी करने को लेकर हाईकमान पर दबाव है।
साथ ही लोकसभा चुनाव में हारे हुए नेताओं को संगठन में जिम्मेदारी देने का भी विरोध किया जा रहा है। कांग्रेस हाईकमान के लिए सबसे बड़ी चुनौती हरियाणा और महाराष्ट्र में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर है। वहां की राज्य सरकार के मुखिया भूपेंद्र सिंह हुड्डा और पृथ्वीराज चव्हाण के खिलाफ जबरदस्त विरोध सामने आ रहा है।